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एक प्रेरणा : शिक्षाविद जनार्दन राय और उनके कार्यकाल की कहानी

लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) :  खगडिया जिले के परबत्ता प्रखंड अंतर्गत कवेला पंचायत के डुमरिया खुर्द गांव निवासी साहित्यकार सेवानिवृत्त शिक्षाविद् जनार्दन राय शिक्षकों के अनुशासन का एक प्रेरणा स्रोत हैं.अपनी उम्र साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित कर देने वाले जनार्दन राय की एक अलग पहचान शिक्षकों के बीच है.जिला ही नहीं बल्कि राज्य स्तरीय शिक्षाविदों में उनकी एक अलग प्रतिष्ठा है.उनके कार्यकाल के दौरान की कई रोचक किस्से हैं जो उनकी अनुशासन व कर्तव्यनिष्ठता का वयान करता है.बताया जाता है कि पूरे अध्यापनकाल के दौरान उन्होंने कभी कक्षा में कुर्सी पर बैठकर बच्चों को शिक्षा नहीं दिया.यहां तक की छात्रों की उपस्थिति पंजी भी वे हमेशा खड़े होकर ही बनाते रहे.उनके विद्यालय पहुंचते ही स्कूल में हड़कंप मच जाता था और शिक्षक व छात्र अपनी-अपनी कक्षा की तरफ दौड़ पड़ते थे.उनके अनुशासन का मिशाल पेश किया जाता था.प्रधानाध्यापक के कार्यकाल के दौरान जब विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उच्च पद पर बैठे एक राजनीतिज्ञ के पौत्र का विद्यालय में नामांकन करने का उन्हें मौखिक आदेश दिया तो उन्होंने पैरवी करने वाले अधिकारी को स्पष्ट रूप से कह दिया था कि सर नामांकन तिथि के बाद नामांकन नहीं लेने का आपका लिखित आदेश है.ऐसे में नामांकन कैसे लिया जा सकता है ? यदि आप लिखित आदेश दें तो हमें कोई परेशानी नहीं होगी.उन दिनों यह मामला विभाग व क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया था.अपनी ईमानदारी के कारण ही वे कई वर्षों तक शिक्षक संघ के पदाधिकारी पद पर भी विराजमान रहे थे.साथ ही वो दरभंगा व समस्तीपुर जिला शिक्षक संघ के पद पर रहते हुए राज्य कार्यकारिणी के सदस्य भी बने रहे.बिहार के निजी उच्च विद्यालय को राजकीयकृत की घोषणा को लेकर राज्य के माध्यमिक शिक्षक द्वारा किये जा रहे आंदोलन में भी वे काफी सक्रिय रहे थे.इस दौरान उन्हें हजारीबाग का चंदबाडा कैम्प जेल भी जाना पड़ा था.शिक्षकों के आंदोलन का परिणाम ही रहा था कि बिहार के अराजकीयकृत माध्यमिक स्कूल को राजकीयकृत की घोषणा सरकार को करनी पड़ी थी.शिक्षाविद् जनार्दन राय द्वारा गांधी टोपी पहनने की भी एक रोचक कहानी है.वर्ष 1948 में उनका बीए की परीक्षा चल रही थी.परीक्षा तिथि के दिन ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या किये जाने की खबर आई और परीक्षा के आयोजन को रद्द कर दिया गया.गांधी जी की मौत से वे इतने मर्माहत हुए कि उसी दिन से उन्होंने गांधी टोपी पहनना शुरू कर दिया.आज भी वे गांधी टोपी पहनते हैं और वक्त के साथ ही टोपी उनकी पहचान बन गई.साथ ही युवा अवस्था से ही वे खादी वस्त्र धारण करने लगे.स्वतंत्रता संग्राम में भी उनकी अहम भूमिका रही.उनके चाचा स्वर्गीय शालीग्राम मिश्र एक स्वतंत्रता सेनानी थे.साहित्यकार सेवानिवृत्त शिक्षाविद् जनार्दन राय के द्वारा कई कृतियां भी लिखी गई है.जिसमें पाठ्य पुस्तक के अलावा गीत-अगीत,देवाधीदेव,प्ररेणा प्रदीप,रीत पूनीत आदि सहित कई शैक्षणिक पुस्तक का नाम शामिल है. इसके अतिरिक्त एक नाटककार के रूप में उनकी अलग पहचान रही है.सेवानिवृत्त होने के 36 वर्ष बीत जाने के बाद 93 वर्ष की आयु में आज भी उनका पठन- पाठन का कार्य बरकरार है और साथ ही उनके द्वारा समाज में शिक्षा का दीप जलाया जा रहा है.राज्य संघ के द्वारा प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘प्राच्य प्रभा’ से भी वे वर्षों तक संपादकीय विभाग में जुड़े रहे. इनकी रचना महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली के कई पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है.साथ ही आकाशवाणी पटना व दरभंगा से शैक्षणिक विषयों पर इनकी काव्य रचनाओं का प्रसारण होता रहा है.वर्ष 1925 में जन्म लेने वाले जनार्दन राय ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा नयागांव के श्री कृष्ण उच्च विद्यालय एवं उच्च शिक्षा टीएनजे कॅालेज भागलपुर से पूरी की थी.आज के दिनों में यह कॅालेज टीएनबी के नाम से जाना जाता है.वहीं से वर्ष 1950 में हिन्दी विषय से उन्होंने एम० ए० तथा डीआईपी इन एड की डिग्री प्राप्त किया था.यह भी एक सुखद संयोग रहा कि जिस विद्यालय से उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की उसी विद्यालय में वे वर्ष 1950 से 1952 तक एक शिक्षक के रुप में कार्यरत रहे.जिसके उपरांत वर्ष 1952 में सारण जिले के शीतलपुर हाईस्कूल में योगदान देने चले गये.कुछ दिनों के बाद ही वे उसी जिले के एक प्रतिष्ठित विद्यालय जय गोविन्द हाईयर सकेंडरी स्कूल दीघवाडा का उप प्राचार्य बनें.वक्त के साथ वर्ष 1969 में तत्कालिन दरभंगा जिले के उच्च विद्यालय भहवानपुर देसुआ में प्रधानाध्यापक पद को सुशोभित किया और वर्ष 1982 में वे सेवानिवृत्त हो गए.लेकिन यह भी एक विडंबना रही है कि जिले के एक प्रतिभावान साहित्यकार व सेवानिवृत्त शिक्षाविद् जनार्दन राय की तरफ ना तो स्थानीय किसी संगठन व ना ही जिला प्रशासन की कभी नजर गई और ना ही उन्हें किसी विशेष दिवस पर जिले में सम्मानित होने का अबतक गौरव प्राप्त हो सका.ये एक अलग बात है कि इस बात का ना तो उन्हें मलाल है और ना ही उनके परिवार को.हलांकि शिक्षा के क्षेत्र में अहम योगदान के लिए दिल्ली की संस्था जगदीश चौरसिया मेमोरियल ट्रस्ट ने उन्हें वर्ष 2015 में लाइफ टाइम एचिमेंट अवार्ड से नवाज़ा था.साथ ही वे राज्य दूरदर्शन के साहित्य सांस्कृतिक संस्थान के द्वारा भी शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए सम्मानित हो चुके है.साहित्य व शिक्षा के क्षेत्र में अहम योगदान के साथ ही उनकी खेलोें में भी काफी रुचि रही है. वालीवॅाल,रम्मी एवं वृज खेल उनकी प्रसंदीदा खेलों में शामिल है.गौरतलब है रम्मी ओर वृज खेल ब्रिटिश शासन के समय उनके अधिकारी खेला करते थे.जिसमें उन्होंने पुराने तिरहुत कमिश्नर का चैम्पियन खिताब भी अपने नाम किया था.महादेवी वर्मा,विद्यापति, सुमित्रानंद पंत,रामधारी  दिनकर,हरिवंश नारायण बच्चन,विलियम शेक्सपीयर ,डॅा.रामधारी सिंह दिनकर एवं इलियट की पुस्तकें व रचनाएं उन्हें काफी प्रभावित करती रही है और उन्हें ही वो अपने जीवन की प्रेरणा स्रोत मानते हैं.

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