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बायोफ्लॉक विधि से मछली पालन, जल में तैरता हुआ मुनाफा




लाइव खगडिया (मुकेश कुमार मिश्र) : जिले के परबत्ता प्रखंड के मध्य विद्यालय, भरतखण्ड में कार्यरत शिक्षक सह संकुल समन्वयक तिरंजय कुमार शिक्षा के साथ-साथ मत्स्य पालन को भी बढ़ावा देे रहे हैं. इस क्रम में वे नयी तकनीक का व्यवहार कर कम पानी व कम खर्च में अधिक मात्रा में मछली उत्पादन कर रहे हैं. शिक्षक तिरंजय कुमार का मत्स्य पालन के क्षेत्र में कदम बढाने का किस्सा भी रोचक है. बताया जाता है कि बायोफ्लॉक विधि से मछली पालन शुरू करने की प्रेऱणा उन्हें यूट्यूब से मिला. साथ ही मछली पालन का प्रशिक्षण उन्होंने लखीसराय में प्राप्त किया. जिसके उपरांत पश्चिम बंगाल से कलम काट प्रजाति के मछली का बीज लाकर उन्होंने बुद्धनगर भरतखण्ड में चार तारपोलिन टैंक प्लांट बनाकर मछली पालन शुरू कर दिया. बायोफ्लॉक तकनीक को सीमित जगह में अधिक उत्पादन देने वाला तकनीकी कहा जाता है. इस तकनीकी में टैंक सिस्टम में उपकारी बैक्टीरिया के द्वारा मछलियों की विष्ठा और अतरिक्त भोजन को प्रोटीन सेल में परिवर्तित कर मछलियों के भोज्य पदार्थ के रूप में रूपांतरित किया जाता है. शिक्षक तिरंजय कुमार की मानें तो प्रशिक्षण के दौरान बताया गया कि तकनीक से 10 हजार लीटर क्षमता के टैंक (एक बार की लागत रु. 32 हजार, 5 वर्ष हेतु) से लगभग छः माह (पालन लागत रु. 24 हजार) में विक्रय योग्य 3.4 क्विंटल मछली ( मूल्य लगभग 40 हजार) का उत्पादन कर अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है. इस तरह वार्षिक शुद्ध लाभ 25 हजार रूपया प्रति टैंक प्राप्त किया जा सकता है. कहा जाता है कि यदि मंहगी मछलियों का उत्पादन किया जाये तो यह लाभ 4.5 गुना अधिक हो सकता.

हलांकि इस लॉकडाउन में मछली का दाना उपलब्ध नही होने के कारण मत्स्य पालकों की परेशानी भी बढ़ी है. शिक्षक तिरंजय कुमार बताते हैं कि वे लोगों को बायोफ्लॉक तकनीक द्वारा मछली उत्पादन करने प्रेरित करेगें. साथ ही वे बताते हैं कि तालाब में मछली पालने में कडी निगरानी रखनी पड़ती है. क्योंकि मछलियों को सांप और बगुला जैसे जीव उड़ा ले जाते हैं. लेकिन बायोफ्लॉक वाले जार के ऊपर शेड या नेट डाल देने से मछलियां मरती भी नहीं है और किसान को नुकसान भी नहीं होता है. बायोफ्लॉक तकनीक में मछली में पंगेसियस, तिलापिया, देशी मांगुर, सिंघी, कोई कार्प, पाब्दा एवं कॉमन कार्प आदि प्रजातियों की मछली का उत्पादन किया जाता है.

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