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मंदिर का पट खुलते ही सती बिहूला मां विषहरी की पूजा के लिए उमड़े श्रद्धालु

लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) : जिले के परबत्ता प्रखंड अंतर्गत कोलवारा गांव में अंगप्रदेश की लोकगाथा पर आधारित बिहुला विषहरी पूजा एवं मेला शुरू हो चुका है. कोलवारा पंचायत के वार्ड नंबर 18 में स्थापित मां विषहरी मंदिर बिहुला विषहरी पूजा के लिए चर्चित रहा है. मां बिषहरी मेला कमिटी के प्रबंधक अनिरुद्ध दास, अध्यक्ष जयप्रकाश दास, कोषाध्यक्ष सुदिन दास, सचिव सीताराम दास, सदस्य विपीन दास, अजय दास, अशोक दास, ज्ञानी दास, इन्द्र देव दास, खगेश दास, पप्पू दास, शंभू, देवन, निरंजन, अभिनंदन, मुरारी, राजकरण, संजय भगत, बब्लू दास आदि ने बताया कि विगत छः दशकों से बाला बिहुला विषहरी की पूजा श्रद्धा भक्ति से किया जाता रहा है. इस दौरान रात्रि में स्थानीय कलाकार बाला बिहुला विषहरी पर आधारित कथा पर नृत्य व झांकी प्रस्तुत करते हैं. वहीं बताया गया कि ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर का निर्माण किया गया है तथा प्रत्येक वर्ष श्रद्धा भक्ति के साथ हर्षोल्लास के साथ बाला बिहुला विषहरी पूजन किया जाता है.

पिंडी पर स्थापित किया गया प्रतिमा

मां बिषहरी मंदिर कोलवारा में देर रात प्रतिमा को स्थापित किया गया तथा मंदिर का पट खोल दिया गया. मंदिर का पट खुलते ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी. बताया जाता है कि भागलपुर अमरी विशनपुर निवासी छीतन दास ने प्रतिमा का निर्माण किया है. ग्रामीणों की मानें तो विषहरी पांच बहन जया विषहरी, पदुम कुमारी, दोतिला भवानी, मैना विषहरी, देवी विषहरी, सती बिहुला, बाला लखेंद्र, चंद्रधर सौदागर आदि की प्रतिमा प्रत्येक साल बनाकर स्थापित करने की परंपरा है. पूजन में जिला ही नहीं बलकि अन्य जिलों से भक्त यहां पहुंचते हैं.

पौराणिक कथा के अनुसार बिहुला विषहरी की कहानी भागलपुर चंपानगर के तत्कालीन बड़े व्यावसायी और शिवभक्त चांदो सौदागर से शुरू होती है. विषहरी शिव की पुत्री कही जाती हैं. लेकिन उनकी पूजा नहीं होती थी. विषहरी ने सौदागर पर दबाव बनाया परंतु वह शिव के अलावा किसी और की पूजा को तैयार नहीं हुए. ऐसे में आक्रोशित विषहरी ने उनके पूरे खानदान का विनाश शुरू कर दिया. छोटे बेटे बाला लखेन्द्र की शादी उज्जैन नगरी के बिहुला से हुई थी. उनके लिए सौदागर ने लोहे बांस का एक घर बनाया ताकि उसमें एक भी छिद्र न रहे. यह घर अब भी चंपानगर में मौजूद है. सुहागरात के दिन ही विषहरी के भेजे दूत नाग ने रात्रि 12 बजे सिंह नक्षत्र के प्रवेश करते ही बाला लखेंद्र को डस लिया. जिससे उनकी मौत हो गयी. बिहुला सती थी, इसलिए उसने हार नहीं मानी. सती बिहुला पति के शव को केले के थम से बने नाव में लेकर गंगा के रास्ते स्वर्गलोक तक चली गई और पति का प्राण वापस कर आयी. तब सौदागर भी विषहरी की पूजा के लिए राजी हुए. लेकिन बाएं हाथ से. तब से आज तक विषहरी पूजा बाएं हाथ से ही होती है. इस परिक्षेत्र में बिहुला विषहरी की पूजा नाग पंचमी से शुरू होती है और लगातार एक माह तक चलती है.

हर साल एक ही तिथि को होती है बिहूला विषहरी पूजा

ग्रामीण अनिरूद्ध दास, संजय कुमार ने बताया कि हर साल एक ही तिथि 16 अगस्त की देर रात्रि विषहरी व सती बिहुला की पूजा प्रारंभ होती है. मध्य रात्रि में सिंह नक्षत्र का प्रवेश होता है तथा पिंडी पर प्रतिमा स्थापित किया जाता है. 17- 18 अगस्त को हरेक साल लोग डलिया चढ़ाने के साथ दूध व लावा का भोग लगाते हैं. भगत की पूजा समाप्त हो जाती है. दोपहर में भजन कार्यक्रम होता है और 19 अगस्त को शाम को धूमधाम से प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है. दो तरह से पूजा होती है. जिसमें एक सामान्य रूप से प्रतिमा स्थापित करके पूजा की जाती है. वहीं भगत पूजा का कार्यक्रम होता है तथा मंजूषा स्थापित किया गया है.

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