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कोई तो है…जो आज भी गुरू-शिष्य के पौराणिक परंपरा का कर रहा निर्वहन

लाइव खगड़िया : पैसा…पैसा…पैसा…आज के अर्थ युग में एक तरफ धन-दौलत की वजह से खून के रिश्ते भी कलंकित होते जा रहे हैं.साथ ही भौतिक युग में हम अपनी संस्कृति को भी भूलते जा रहे हैं.लेकिन आज भी कोई है जो ना सिर्फ पौराणिक परंपरा को जिन्दा रखने की कवायद में जुटे हुए हैं बल्कि गुरु-शिष्य के पौराणिक परंपरा का सादगी से निर्वहण कर रहे हैं.शहर के विश्वनाथ गंज निवासी तबला वादक फूल कुमार राय गुरु-शिष्य के प्राचीन परंपरा को संगीत ज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ा रहे है.प्राचीन काल में गुरु और शिष्य के संबंधों का आधार था गुरु का ज्ञान,मौलिकता और नैतिक बल.उनका शिष्यों के प्रति स्नेह भाव तथा ज्ञान बांटने की निःस्वार्थ भाव ही उन्हें आज के गुरुओं से अलग करती है.दूसरी तरफ शिष्यों का भी गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण,आज्ञाकारिता व अनुशासन महत्पूर्ण गुण माना जाता था.आज भी इस परंपरा को 78 वर्षीय तबला वादक फूल कुमार राय उतनी ही संजीदगी से निर्वाहन कर रहे हैं जितनी प्राचीन काल में की जाती थी.

 

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इस क्रम में वो अपने शिष्यों को निःशुल्क संगीत की शिक्षा देते हैं.उनके द्वारा शिष्यों के चयन का तरीका भी रोचक है.बताया जाता है की वो संगीत साधना में जिज्ञासा रखने वाले का चाल-व्यवहार व अनुशासन परख कर संगीत साधना में मार्गदर्शन के लिए हामी भरते हैं.आज की तारीख में भी उनके पास करीब 15 ऐसे शिष्य हैं जो उनसे निःशुल्क तबला वादन का हुनर सीख रहे हैं.जिसमें से कुछ शिष्य पटना सहित आस-पास के जिलों के भी बताये जाते हैं.उत्तर प्रदेश के सारनाथ में वर्ष 1987 में आयोजित राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में सम्मान पाने वाले विद्वान तबला वादक फूल कुमार राय तबला वादन के सबसे कठिनतम विधा छंद प्रबंध स्तुति के ज्ञाता माने जाते हैं.बताया जाता है की तबला वादन के इस विधा से देवी-देवताओं की स्तुति की जाती है और देश भर में इस विधा के गिने-चुने ही ज्ञाता हैं.वहीँ कोशी सहित आसपास के क्षेत्रों में तबला के छंद प्रबंध स्तुति में फूल कुमार राय एकलौते बताये जाते हैं.तबला वादक घराना से नाता रखने वाले फूल  कुमार राय के पिता स्वर्गीय गुरु गोविंद प्रसाद राय की गिनती अपने जमाने में प्रख्यात तबला वादक के रूप में रही थी.पश्चिम बंगाल सहित आसपास के राज्यों में उनका नाम था.

 

मूल रूप से भागलपुर जिला के रहने वाले विद्वान तबला वादक गुरु गोविंद प्रसाद राय वर्ष 1971 में खगड़िया चले आये और फिर तो वो यहीं के होकर रह गए.तबला वादन के क्षेत्र में उनकी विरासत को आज उनके पुत्र फूल कुमार राय आगे बढ़ा रहें हैं.इतना ही नहीं फूल कुमार राय की आगे की पीढ़ी भी संगीत की खानदानी विरासत को आगे बढ़ाने को तैयार बैठी है.उनके 6 संतानो में से 5 संगीत कला के विभिन्न विधाओं से ही विभिन्न जगहों पर जुड़े हुए हैं.उम्र के एक पड़ाव पर आने के वाबजूद आज भी फूल कुमार राय हर दिन सुबह-सबेरे तबला पर घंटो रियाज करते हैं.साथ ही वो पटना,कोलकाता, वाराणसी,बदायूं जैसे शहरों में आयोजित राज्य व राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में एक्सपर्ट के रूप में आमंत्रित होते रहे हैं.लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि इन दिनों स्थानीय स्तर पर उनकी कला को वो सम्मान नहीं मिल रहा जिसका वो वास्तविक रूप से हक़दार हैं.बताया जाता है की वर्ष 2015 तक युथ फेस्टिवल जैसे आयोजनों में जिला प्रशासन उन्हें आमंत्रित करती रही थी.लेकिन उसके बाद जुगाड़ तकनीक की फलती-फूलती विधाओं के बीच उनकी उपेक्षा शुरू हो गई.हालांकि वसूल व अनुशासन के पक्के फूल कुमार राय को इन बातों से कोई खास फरक नहीं पड़ता. लेकिन कहीं ना कहीं ये बातें उनके दिल को एक टिस तो जरूर ही पहुंचातीं होंगी.

 

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