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चांदी के भारी भरकम झूले के पालने पर दर्शन दे रहे श्री राम




लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) : जिले के परबत्ता प्रखंड के खजरैठा गांव में अतिप्राचीन भगवान श्री राम मंदिर में पांच दिवसीय झूलनोत्सव कार्यक्रम रविवार से प्रारंभ हुआ. जो कि 15 अगस्त तक चलेगा. कार्यक्रम को लेकर खजरैठा गांव में उत्साह का माहौल बना हुआ है. वहीं भगवान श्री राम मंदिर को आकर्षक ढंग से सजाया गया है. जहां सुबह-शाम दोनों पहरों में भक्ति संगीत का कार्यक्रम लगातार पांच दिनों तक चलता रहेगा. बताया जाता है कि यह जिले का एकलौता अतिप्राचीन श्रीराम मंदिर है, जहां का झूलनोत्सव कार्यक्रम सदियों पुरानी है.

भगवान श्री राम मंदिर का इतिहास

खजरैठा गांव का भगवान श्री राम मंदिर अति प्राचीन है. पूर्व जिला परिषद सदस्य पंकज कुमार राय कि मानें तो उनके पूर्वज स्व. गोपाल राय के द्वारा विक्रम संवत 1969 ई० में भगवान श्री राम मंदिर की स्थापना की गई थी. तब अयोध्या से आए हुए पंडित राम दास जी के द्वारा प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था. लेकिन सन् 1957 ई० में गंगा की गोद में मंदिर सहित गांव विलिन हो गया. जिसके उपरांत पून: स्व. छेदी प्रसाद राय एवं स्व. लक्ष्मी नारायण राय ने मंदिर भवन का निर्माण कराया और यहां पूजा प्रारंभ हुआ. मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित भगवान श्री राम, लक्ष्मण,जानकी, हनुमान, लक्ष्मी नारायण, भगवान विष्णु, भगवान सालीग्राम का आकर्षक प्रतिमा आज भी विराजमान है.

पालने में झूलेगें भगवान

सदियों से चली आ रही हैं परंपरा को स्व. गोपाल राय के वंशज आज भी बरकरार रखें हुए हैं. एक वजनदार चांदी के झूले के पालने पर भगवान श्री राम के साथ लक्ष्मण, माता जानकी , हनुमान, लक्ष्मी नारायण, भगवान विष्णु, भगवान सालीग्राम को श्रावण मास के शुक्ल पक्ष एकादशी से लेकर श्रावण की पूर्णिमा तक झूलाया जाता है.

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पांच दिन तक बहेगी भक्ति की बयार

खजरैठा गांव स्थित भगवान श्री राम मंदिर के प्रागंण में आयोजित झुलनोत्सव कार्यक्रम में अंग प्रदेश के मशहूर संगीत कलाकार स्व. दिगंबर महंत के पुत्र नरेन्द्र उर्फ मंटू महंत अपना मधुर संगीत बिखेरेंगे. संगीत कला मे निपुण मंटू महंत लगातार पांच दिनों तक संध्या के समय भक्ति संगीत पेश करेंगे. वहीं सुबह एवं संध्या के समय विशेष पूजन के साथ प्रसाद का वितरण भी किया जाता रहा है. उल्लेखनीय है कि इस मंदिर में झूलनोत्सव कार्यक्रम के अलावा रामनवमी, कृष्ण जन्मोत्सव, शरद् पूर्णिमा आदि जैसे मौके पर विशेष पूजा का भी आयोजन किया जाता है.




श्रावण मास में झूलनोत्सव का है विशेष महत्व

कहा जाता है कि सावन में झूला झुलाने की परंपरा त्रेता काल से ही चला आ रहा है. वैसे भी भारतीय संस्कृति में झूलनोत्सव का विशेष महत्व है. झूलनोत्सव की शुरूआत मणिपर्वत से ही होती है. मणिपर्वत से कई किवदंतिया जुड़ी हुई हैं. मान्यता है कि राजा जनक जब अपनी बेटी सीता के घर आए तो परंपरा के अनुसार बेटी के घर न रुक कर उन्होंने ठहरने के लिए जो स्थान लिया उसके एवज में उन्होंने इतनी मणियां दे दी कि उसने पहाड़ का रूप धारण कर लिया. जिस स्थान पर वे रहते रहे उस स्थान का नाम जनकौरा पड़ा. जो वर्तमान में जनौरा के नाम से जाना जाता है. एक किवदंती यह भी है कि राजा कुश ने नागराज की बेटी पर क्रोधित होकर सम्पूर्ण नागवंश को समाप्त करने की बात कही तो नागराज ने इतनी मणियां उगली कि वह पर्वत बन गया. यही आगे चल कर मणि पर्वत के नाम से विख्यात हुआ. एक अन्य मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि जब भगवान राम 14 वर्ष वनवास के बाद अयोध्या लौटे तो सीता जी ने एक दिन यूं ही कह दिया कि हरियाली युक्त पर्वतों पर विचरण की याद आ रही है. उसी समय भगवान राम ने गरुण से वैसे ही पर्वत के निर्माण का आग्रह किया और गरुण ने मणियों से युक्त पर्वत का निर्माण कर दिया. सीताजी यहीं पर क्रीड़ा करने आती रहीं. यहां सावन में उनके लिए झूला पड़ता रहा. यही वजह है कि झूलनोत्सव मणिपर्वत से ही शुरू हुआ. जिसको लेकर सावन में झूला पूजा का एक खास महत्त्व रहा है. इस अवसर पर हर श्रद्धालु भगवान को झूला झुलाने को लालायित रहते हैं.


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