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साहित्यिक क्षेत्र में डॉ कामाख्या चरण मिश्र ने हासिल किया एक नया मुकाम




लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) :  हिंदी के लेखक, साहित्यकार डॉ कामाख्या चरण मिश्र के बारे में भले ही जिले के कम ही लोग वाकिफ हो, लेकिन साहित्यिक क्षेत्र को उनकी कलम ने एक विस्तृत संसार दिया है. उनकी लेखनी साहित्यिक क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना चुकी है.

डॉ कामाख्या चरण मिश्र की निबंध, आलेख, एकांकी, नाटक बिहार के प्रसिद्ध पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है. जिसमें श्री कृष्ण (विद्यालय पत्रिका), बेला (निराला निकेतन पत्रिका ) मुजफ्फरपुर , धर्मायण (महावीर मंदिर प्रकाशन,पटना) तथा बिहार सरकार के “राजभाषा” पत्रिका में प्रकाशन शामिल है. साथ ही उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी है. उनकी कुछ प्रकाशित कृतियों में प्रिय प्राण मानस का रस (आध्यात्मिक आलेख), आचार्य – कवि श्री जानकीवल्लभ शास्त्री जी के गीतों का शास्त्रीय अध्ययन  (शोध ग्रंथ ), कंदर्प – कामिनी (नारी-शास्त्र) , कँटीला रास्ता (एकांकी नाटक संग्रह) काफी चर्चाओं में रहा है. जबकि हाल ही में प्रकाशित उनकी पुस्तक सूनी डाल महकते फूल (कहानी – संग्रह) भी काफी लोकप्रिय रहा है. जिसमें “नेटवर्किंग विवाह का दर्द”, “माँ की बृद्धाश्रम यात्रा”  एवं “पितृ स्नेह” जैसी कई कहानियां हैं.

जिंदगी की कहानी रही अनकही (संस्मरण) , मेदनी पुराण (हास्य साहित्य) , हिंदी के अप्रतिम गीतकार : आचार्य कवि जानकीवल्लभ शास्त्री (समीक्षात्मक ग्रन्थ) , जानकी दीदी ( उपन्यास) , “श्यामा संगीत” के गीतों की समीक्षा , सुमरित दिव्य दृष्टि हियँ होती (गुरुतत्व विश्लेषण)  और स्मृति सुगंध (संस्मरण) उनकी कुछ अप्रकाशित कृतियां है. उनकी पुस्तक समीक्षा का प्रकाशन नई दिल्ली से होता है. 

डॉ कामाख्या चरण मिश्र का जन्म 13 मार्च 1957 को जिला के परबत्ता प्रखंड के नयागांव में हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव से हुई थी. जबकि स्नातक व  एमए के बाद उन्होंने सन् 1992 में तिलकामांझी विश्वविद्यालय से पीएचडी किया था. वे बांका को एमएसपीएस कॉलेज, शंभुगंज में हिन्दी के प्राध्यापक रहे हैं और फिलहार वे बांका के ही एसकेपी विद्या विहार राजपुर में हिन्दी के शिक्षक के तौर पर कार्यरत है. साथ ही वे अपने पिता की विरासत को आगे बढाते हुए एक लेखक, साहित्यकार के साथ-साथ ज्योतिष शास्त्र के रूप में जाने जाते हैं. डॉ कामाख्या चरण मिश्र का अपने गांव नयागांव आना-जाना होता है. बहरहाल वे साहित्यिक क्षेत्र में एक अलग मुकाम को हासिल कर चुके हैं. 


डॉ कामाख्या चरण मिश्र के पिता साहित्य महोपाध्याय ब्रह्मलीन पंडित प्रो जनार्दन मिश्र “पंकज” बंगाल के विश्व भारती विश्वविद्यालय शांतिनिकेतन के प्रोफेसर रह चुके थे. जो कि संस्कृत और हिंदी के प्रकाण्ड विद्वान के रूप में जाने जाते थे. उन्होंने 6 विषयों से एमए की डिग्री हासिल किया था. जिसमें 3 विषयों में उन्हें स्वर्ण पदक प्राप्त मिला था. वे साहित्यिक पत्रिका अरुणोदय और प्राची के संपादक भी रहे थे. उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी. जिसमें संस्कृत व्याकरण, संस्कृत ज्ञान गंगा , भावदर्श , संस्कृत मंजरी आदि प्रमुख पुस्तकें थी. इतना ही नहीं उनका संस्कृत और हिंदी की कई पुस्तकें उस समय बिहार बोर्ड के पाठ्यक्रम में शामिल था. जिसे प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाया जाता था. साथ ही उन्होंने दर्जनों उपन्यास भी लिखें थे. जिसका कलम- कसाई, कलावती भारत, वीरान कोठे, श्मशान की चाँदनी , शेष धारा  आदि शामिल था. परिजनों की मानें तो  6 जून 1977 को वे समाधि में लीन हो गये थे. उनके निधन की खबर उस वक्त बीबीसी रेडियो समाचार में भी प्रसारित हुआ था.

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