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मिथिला संस्कृति का लोकपर्व मधुश्रावणी पूजा नहाय-खाय के साथ आरंभ




लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) : सावन महीने के कृष्ण पक्ष पंचमी से आरंभ एवं शुक्ल पक्ष तृतीया को सम्पन्न होने वाली मिथिला संस्कृति व भक्ति का लोक पर्व मधुश्रावणी पूजा गुरुवार को नहाय खाय के साथ प्रारंभ हुआ. नव विवाहित महिलाएं के द्वारा किये जाने वाले इस पूजा का विशेष महत्व है. गुरुवार को नवविवाहित महिलायें प्रात: पवित्र गंगा स्नान कर पूजा पाठ करने के पश्चात अरवा भोजन ग्रहण किया और साथ ही अपने हाथो में मेंहदी रचाई. इस बार चौदह दिनो की पूजा होगी और 10 जुलाई से प्रारंभ होकर 23 जूलाई तक चलेगी. कोरोना संक्रमण को लेकर इस बार मुख्य लग्न के दौरान परिणय सूत्र में बंधने का कार्यक्रम कम रहा. संकट के इस दौर में नवविवाहिता रिवाजों को निभाते हुए सादगी पूर्वक पर्व को मनाएगें. मिथिला की समृद्ध विरासत को अगली पीढी तक पहुंचाने का संकल्प के साथ मुक्ति झा की मिथिला पेंटिंग इन दिनों चर्चा में है. उन्होने मधुश्रावणी के पूजा शुरू होने के पूर्व नवविवाहिता द्वारा हाथों में रचती मेंहदी को मिथिला पेंटिंग के माध्यम से दर्शाया है.

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प्रियतम का रहता है इंतजार

स्वादिष्ट भोजन,सुंदर कपड़े,गहने,फूल लोढ़ने के क्रम में सखियों से मिलन…सावन का पड़ता फुहार व उमड़ते-घुमड़ते बादलों के बीच प्रियतम का याद आना स्वाभाविक है.ऐसे में नवविवाहिताओं को इस पर्व में अपने प्रियतम का बेसब्री से इंतजार रहता है. साधारणत: नवविवाहित इस अवसर पर ससुराल जाते भी है.साथ ही रोजी-रोटी के लिए कहीं दूर देश रहने वालों की भी कोशिश होती है कि वे इस पर्व के अवसर पर ससुराल पहुंचकर सावन का आनंद लें. लेकिन कोरोना संक्रमण की वजह से इस बार कई नवविवाहिाओं का इंतजार लंबा हो सकता है.

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कथा का विशेष महत्व

पंडित अजय कांत ठाकुर बताते है कि ऐसी मान्यता है कि माता पार्वती सबसे प्रथम मधुश्रावणी व्रत रखी थी व जन्म-जन्मांतर तक भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करती रही.यह बात हर नवविवाहिताओं के दिलो-दिमाग में रहता है.यही कारण है कि इस पर्व को पूरे मनोयोग से मनाती है.इस पर्व के दौरान माता पार्वती व भगवान शिव से संबंधित मधुश्रावणी की कथा सुनने का प्रावधान है.खास कर समाज की वृद्धाओं द्वारा कथा सुनाया जाता है. वहीं बासी फूल,ससुराल से आये पूजन सामग्री,दूध-लावा व अन्य सामग्री के साथ नाग देवता व विषहर की भी पूजा की जाती है.माना जाता है कि इस प्रकार की पूजा-अर्चना से पति दीर्घायु होते हैं.शादी के प्रथम वर्ष इस त्योहार का अपने-आप में विशेष महत्व है, जिसकी अनुभूति को नवविवाहिता व नवविवाहित ही कर सकते हैं.

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कहतीं हैं नव विवाहिताएं

नवविवाहिता निधि, शिवानी आदि ने बताया कि यह पूजा एक तपस्या के समान है.इस पूजा में लगातार सोलह दिनों तक नव विवाहित महिलायें प्रतिदिन एक बार अरवा भोजन करती हैं.इसके साथ ही नाग-नागिन,हाथी,गौरी-शिव आदि की प्रतिमा बनाकर प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के फूलों,मिठाईयों एवं फलों से पूजन किया जाता है.सुबह नाग देवता को दूध लावा का भोग लगाया जाता है.

पूजा का है महत्व

मधुश्रावणी पूजन का काफी महत्व बताया जाता है.इस पर प्रकाश डालते हुए पंडित कृष्ण कांत झा बताते हैं कि महिलाओं के द्वारा किया जानेवाला यह पर्व पति को दीर्घायु होने तथा उनके सुख-शांति के लिये की जाती है.पूजन के दौरान मैना पंचमी, मंगला गौरी,पृथ्वी जन्म,पतिव्रता, महादेव कथा,गौरी तपस्या,शिव विवाह, गंगा कथा,बिहुला कथा तथा बाल वसंत कथा सहित 14 खंडों में कथा का श्रवण किया जाता है.गांव-समाज की बुजुर्ग कथा वाचिकाओं के द्वारा नव विवाहिताओं को समूह में बिठाकर कथा सुनायी जाती है.पूजन के सातवें,आठवें तथा नौवें दिन प्रसाद के रुप में घर जोड़,खीर एवं गुलगुला का भोग लगाया जाता है.प्रतिदिन संध्याकाल में महिलायें आरती,सुहाग गीत तथा कोहवर गाकर भोले शंकर को प्रसन्न करने का प्रयत्न करती हैं.

मायके-ससुराल दोनों के सहयोग से होती है पूजन

इस पूजन में मायके तथा ससुराल दोनों पक्षों का सहयोग आवश्यक होता है.पूजन करने वाली नव विवाहिताएं ससुराल पक्ष से प्राप्त नये वस्त्र धारण करती हैं.जबकि प्रत्येक दिन पूजा समाप्ति के बाद भाई के द्वारा पूजा करने के लिये मधुश्रावणी का हर सामान ससुराल से ही आता है.परंपरा रही है कि नव विवाहिता के मायके के सभी सदस्यों के लिये कपड़ा, व्रती के लिये जेबरात, विभिन्न प्रकार के कपड़ा,भोज के लिये सामान भी ससुराल से ही आता है.वहीं चना को अंकुरित कर इसे भेजे जाने का भी रिबाज रहा है. ससुराल से नाग-नागिन सहित विषहारा के सभी बहनों को मिट्टी से बना उसे रंग-रोगन कर,मैना पत्ता व अन्य पूजा सामग्री के साथ भेजा जाता है. पूरे पूजा के दौरान आस्था व श्रद्धा के साथ विषहारा की पूजा-अर्चना की जाती है और साथ ही गीत गाये जाते हैं.हर दिन पांच बीनी कथा भी ब्रतियों को सुनायी जाती है.कहा जाता है कि जो महिला ये पांचो बीनी नियमित रूप से पढती हैं उसे हर प्रकार का सुख प्राप्त होता है और परिवार में कभी भी सर्पदोष की शिकायतें नहीं होती.

मैना पत्ता पर होती है पूजा

मधुश्रावणी पूजन मे नवविवाहिता मैना पात पर नाग-नागिन की बनी आकृति पर दूध-लावा चढाकर अपने सुहाग के साथ-साथ परिवार के लिए मंगलकामना करती है.कहा जाता है कि माता पार्वती ने अपने कठिन व्रत के फलस्वरूप इसी सावन मास मे शंकर जी को वर के रूप में प्राप्त की थी.मौना पंचमी के मौके पर नाग देवता की पूजा के बाद शाम में धान का लावा और मिट्टी को मिलाकर तथा इसे अभिमंत्रित कर घर आंगन दरवाजा के विभिन्न भागों में छीटा जाता है.मधुश्रावणी में मिट्टी और गोबर से बने नाग की पूजा की जाती है.

पूजा में भाई का भी विशेष योगदान

इस पूजन में नवविवाहिता के भाई का बहुत ही बड़ा योगदान रहता है.प्रत्येक दिन पूजा समाप्ति के बाद भाई अपनी बहन को हाथ पकड़ कर उठाता है.नवविवाहिता अपने भाई को इस कार्य के लिए दुध,फल आदि प्रदान करती है.

टेमी दागने की भी परंपरा

पूजा के अंतिम दिन पूजन करने वाली महिला को कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ता है.टेमी दागने की परंपरा में नव विवाहिताओं को गर्म सुपारी,पान एवं आरत से हाथ एवं पांव को दागा जाता है.इसके पीछे मान्यता है कि इससे पति-पत्नी का संबंध मजबूत होता है.


पकवानों से सजती है डलिया

पूजा के अंतिम दिन 14 छोटे बर्तनों में दही तथा फल-मिष्ठान सजा कर पूजा किया जाता है.साथ ही 14 सुहागन महिलाओं के बीच प्रसाद का वितरण कर ससुराल पक्ष से आए हुए बुजूर्ग से आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है.उसके उपरांत पूजा का संपन्न होती है.

आज भी बरकरार हैं पुरानी परंपरा

सदियों से चली आ रही मिथिला संस्कृति का महान पर्व आज भी बरकरार है और नवविवाहिता श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजा करती हैं.इस क्रम में महिलाएं समूह बनाकर मैथिली गीत गाकर भोले शंकर को खुश करती हैं और आने वाले पीढ़ी को आगाज करती हैं कि इस परंपरा को बरकरार रखना है.इस पर्व में मिथिला संस्कृति की झलक ही नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती हैं.इस खास पूजन में नवविवाहिता भारतीय संस्कृति के अनुसार वस्त्र व श्रृंगार से सुसज्जित होतीं हैं.

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