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आभासी रील्स, वास्तविक पतन : अजनबियों की फूहड़ प्रशंसा पर रीझती आधुनिक नारी

लाइव खगड़िया : इंटरनेट और सोशल मीडिया ने आज समाज के एक बड़े हिस्से को ‘अटेंशन सीकिंग’ (सस्ती लोकप्रियता की चाहत) की बीमारी से ग्रस्त कर दिया है। आज पहचान का पैमाना ज्ञान, योग्यता या समाज में आपका योगदान नहीं, बल्कि आपकी तस्वीर पर मिलने वाले लाइक्स और कमेंट्स बन चुके हैं। ऐसे माहौल में जब कुछ महिलाएं अपनी तस्वीरों पर अनजान पुरुषों द्वारा किए गए “हुस्न की मलिका“, “जानलेवा हुस्न” और “कयामत” जैसे सस्ते, वस्तुकरण (Objectification) से भरे कमेंट्स को हंसकर स्वीकार करती हैं या उन्हें अपनी प्रोफाइल पर सहेज कर रखती हैं, तो यह आधुनिक स्त्री चेतना पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

वस्तु’ (Object) के रूप में खुद को स्वीकार करना

दशकों से नारीवादी आंदोलनों और विचारकों ने इस बात की लड़ाई लड़ी है कि महिलाओं को केवल एक ‘खूबसूरत वस्तु’ या उपभोग की सामग्री के रूप में न देखा जाए। उन्हें उनकी बुद्धिमत्ता, उनके काम और उनकी शख्सियत के लिए सम्मान मिले। लेकिन जब एक महिला सोशल मीडिया पर अपने रूप-रंग और परिधान पर किए गए ऐसे कमेंट्स को बढ़ावा देती है जो सीधे तौर पर उसे केवल एक शारीरिक वस्तु (Body Object) के रूप में पेश करते हैं, तो वह अनजाने में खुद को उसी रूढ़िवादी ढर्रे में धकेल रही होती है, जिससे बाहर निकलने के लिए पीढ़ियों ने संघर्ष किया है।

‘सस्ते वैलिडेशन’ (Cheap Validation) की भूख

ऐसी टिप्पणियों को नजरअंदाज न करना या उन पर आपत्ति न जताना यह दर्शाता है कि आज की महिला का आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान कितना कमजोर हो चुका है कि उसे खुद को सुंदर या मूल्यवान महसूस करने के लिए राह चलते अजनबियों के कमेंट्स और प्रमाण पत्र की जरूरत पड़ रही है। जब आपकी पहचान केवल इस बात से तय होने लगे कि किसी अनजान यूजर ने आपको “सो क्यूट” या “हॉट” कहा, तो यह मानसिक गुलामी और गहरे अकेलेपन का संकेत है।

सामाजिक मर्यादा और सीमाओं का धुंधला होना

हर समाज और संवाद की एक मर्यादा होती है। वास्तविक जीवन में क्या कोई भी महिला रास्ते में चलते किसी अजनबी पुरुष से यह सुनना पसंद करेगी कि “तुम्हारा हुस्न कातिलाना है”? निश्चित रूप से नहीं, इसे सड़क पर होने वाली छेड़खानी (Eve-teasing) माना जाएगा। फिर सोशल मीडिया के कमेंट बॉक्स में इसी भाषा को ‘प्रशंसा’ का नाम देकर स्वीकार कैसे किया जा सकता है? आभासी दुनिया में इस तरह की अभद्रता को छूट देना वास्तविक जीवन में भी पुरुषों के मन से महिलाओं के प्रति सम्मान और झिझक को खत्म करता है।

आने वाली पीढ़ी के लिए गलत मिसाल

जब समाज की वयस्क और परिपक्व महिलाएं इन चीज़ों को सामान्य मानकर स्वीकार करती हैं, तो वे सोशल मीडिया पर मौजूद किशोरियों और युवा लड़कियों के सामने एक बेहद गलत उदाहरण पेश करती हैं। युवा लड़कियों को लगने लगता है कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य सुंदर दिखना और पुरुषों से ‘हुस्न की मल्लिका’ का खिताब पाना ही है। यह उनके मानसिक और करियर के विकास को रोककर उन्हें केवल बाहरी दिखावे की अंधी दौड़ में झोंक देता है।

प्रशंसा पाना और गरिमा बनाए रखना, दोनों में एक बहुत बारीक रेखा होती है। शालीनता और सम्मानजनक शब्दों में की गई तारीफ स्वीकार्य हो सकती है, लेकिन जो कमेंट्स सीधे तौर पर आपकी देह या रूप-रंग को सनसनीखेज बनाकर पेश करते हों, उन्हें बढ़ावा देना आत्म-सम्मान की बलि चढ़ाने जैसा है। आज की महिलाओं को यह समझना होगा कि वे कोई प्रदर्शनी की वस्तु नहीं हैं, जिनकी कीमत कमेंट बॉक्स में लगने वाले इन शब्दों से तय हो। समय आ गया है कि ऐसी सतही और फूहड़ टिप्पणियों को स्वीकार करने के बजाय, उन्हें कड़ा जवाब दिया जाए या सीधे ब्लॉक किया जाए, ताकि डिजिटल स्पेस में स्त्री की गरिमा सुरक्षित रह सके।

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