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धनतेरस के साथ 5 दिवसीय दीपावली महोत्सव 5 से होगा शुरू

लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) : दीपावली या दिवाली का मतलब “रोशनी का त्योहार” यानी अंधकार से प्रकाश की ओर जाना माना जाता है.जिसमें धन-धान्य की देवी माता लक्ष्मी और विघ्नहर्ता सुखकर्ता गणेश जी की पूजा की जाती हैं.दीपावली को दियों का भी त्योहार कहा जाता है.यह त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है.इस रात घर से लेकर बाहर तक दीपों से सजाने की परंपरा हैं.पांच दिनों तक चलने वाला इस त्योहार की शुरूआत धनतेरस के साथ होती है.इस साल धनतेरस 5 नवम्बर को है.

धनतेरस से दीपावली महोत्सव होगा शरू

महोत्सव की शुरुआत धनतेरस से ही होती है. इसे धन त्रयोदशी भी कहा जाता है.इस दिन मृत्यु के देवता यमराज, धन के देवता कुबेर और आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरि की पूजा का विशेष महत्व है.इसी दिन समुद्र मंथन में भगवान धन्वंतरि अमृत कलश के साथ प्रकट हुए थे और साथ ही आभूषण व बहुमूल्य रत्न भी समुद्र मंथन में मिलने की मान्यता है.इस लिए ही इस दिन का नाम ‘धनतेरस’ पड़ा और इस दिन बर्तन, धातु व आभूषण खरीदने की परंपरा शुरू हुई.

दूसरा दिन छोटी दिवाली

धनतेरस के दुसरे दिन गांव में यमदीरी मनाया जाता है. जिसे छोटी दिवाली या यम चतुर्दशी भी कहा जाता है. इन दिनों घर घर में लोग गोबर का दीप घर से बाहर कर दक्षिण दिशा में जलाने की परंपरा हैं. यह दीप यमराज को समर्पित किया जाता है.



तीसरा दिन 7 नवम्बर को ‘दीपावली’

यह मुख्य पर्व होता है.दीपावली पर्व में विशेष रूप से मां लक्ष्मी का पूजन किया जाता है.कार्तिक माह की अमावस्या को ही समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं.जिन्हें धन, वैभव, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है.इस दिन मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए दीप जलाए जाते हैं ताकि अमावस्या की रात रोशन रहे.दूसरी मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान रामचन्द्रजी माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों का वनवास समाप्त कर घर लौटे थे.श्रीराम के स्वागत हेतु अयोध्यावासियों ने घर-घर दीप जलाया था और नगर भर को आभायुक्त कर दिया था.तभी से दीपावली के दिन दीप जलाने की परंपरा की शुरूआत हुई.

चौथे दिन अन्नकूट या गोवर्धन की पूजा

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट उत्सव मनाना जाता है. इसे पड़वा या प्रतिपदा भी कहते हैं.खासकर इस दिन घर के पालतू बैल, गाय, बकरी आदि जानवरों को अच्छे से स्नान कराकर उन्हें सजाया जाता है. फिर इस दिन घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन बनाए जाते हैं और उनका पूजन कर पकवानों का भोग अर्पित किया जाता है.मान्यता है कि त्रेतायुग में जब इन्द्रदेव ने गोकुलवासियों से नाराज होकर मूसलधार बारिश शुरू कर दी थी, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर गांववासियों को गोवर्धन की छांव में सुरक्षित किया था. तभी से इस दिन गोवर्धन पूजन की परंपरा शुरू हो चली.

पांचवां दिन भाई दूज और यम द्वितीया

भाई दूज,पांच दिवसीय दीपावली महापर्व का अंतिम दिन होता है.भाई दूज का पर्व भाई-बहन के रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने और भाई की लंबी उम्र के लिए मनाया जाता है.रक्षाबंधन के दिन भाई अपनी बहन को अपने घर बुलाता है,जबकि भाई दूज पर बहन अपने भाई को अपने घर बुलाकर उसे तिलक कर भोजन कराती है और उसकी लंबी उम्र की कामना करती है.इस दिन को लेकर मान्यता है कि यमराज अपनी बहन यमुनाजी से मिलने के लिए उनके घर आए थे.यमुनाजी ने उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराया और यह वचन लिया कि इस दिन हर साल वे अपनी बहन के घर भोजन के लिए पधारेंगे. साथ ही जो बहन इस दिन अपने भाई को आमंत्रित कर तिलक करके भोजन कराएगी, उसके भाई की उम्र लंबी होगी.तभी से भाई दूज पर यह परंपरा बन गया है.

दीवाली के दिन विशेष तौर पर लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है. इस दिन घर व कार्यालय में लक्ष्मी जी की पूजा धूमधाम से होती है. दीवाली के दिन लोग धन की देवी लक्ष्मी से समृद्धि की कामना करते हैं.जबकि साधु-संत और तांत्रिक कुछ विशेष सिद्धियां अर्जित करने के लिए रात्रिकाल में अपने तांत्रिक कर्म करते है.



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