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पुलिस की कार्यशैली बनाम उग्र भीड़ की हिंसा, सबलपुर हादसे के दोनों पहलू सोचने पर कर रहा मजबूर

लाइव खगड़िया : जिले के मोरकाही थाना अंतर्गत सबलपुर गांव में जो कुछ भी हुआ, उसने एक मां से उसका बेटा और एक बहन से उसका भाई हमेशा के लिए छीन लिया। आरोपी सौरव कुमार की तालाब में डूबने से हुई मौत के बाद से इलाके में मातम और आक्रोश का माहौल है। लेकिन इस दुखद घटना के बाद उपजे हालात ने समाज और कानून व्यवस्था के सामने कुछ ऐसे गंभीर सवाल छोड़ दिए हैं, जिन पर दोनों पक्षों के नजरिए से विचार करना बेहद जरूरी है।

पहला पहलू: पुलिस की कार्यशैली और रात की छापेमारी पर सवाल

घटना के बाद से स्थानीय लोगों में पुलिस के खिलाफ भारी नाराजगी है। जनता के बीच उठ रहे सवाल काफी हद तक प्रासंगिक भी नजर आते हैं:

क्या ‘सरकारी काम में बाधा’ जैसे मामले में रात की रेड जरूरी थी?

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपियों पर कांड संख्या 61/26 के तहत विधि व्यवस्था और सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप था। ग्रामीणों का तर्क है कि जब मामला मारपीट या सरकारी कार्य में बाधा जैसी धाराओं से जुड़ा था, तो क्या पुलिस के लिए रात के अंधेरे में इस तरह दबिश देना अनिवार्य था? क्या यह कार्रवाई दिन के उजाले में नहीं की जा सकती थी?

पुलिस अभिरक्षा से भागना और सुरक्षा में चूक:

एक बड़ा सवाल यह भी है कि पुलिस टीम ने जब सौरव और अंशु को अपनी कस्टडी में ले लिया था, तो सौरव हाथ छुड़ाकर भागने में सफल कैसे हो गया? कस्टडी से भागने के बाद पुलिस ने अंधेरे का हवाला देकर खोजबीन बंद कर दी, जिसके बाद सुबह उसका शव मिला। इस ढुलमुल रवैए पर जनता का सवाल उठाना लाजमी है।

एक कड़वी सच्चाई: मोरकाही थाना कांड संख्या 61/26 के तहत दर्ज धाराओं (जैसे सरकारी काम में बाधा डालना – IPC की धारा 186/353 या नए कानून BNS की प्रासंगिक धाराएं) में आमतौर पर 2 से 3 साल तक की अधिकतम सजा या जुर्माने का प्रावधान‌ है। चूंकि यह मामला मारपीट और सरकारी काम में बाधा से जुड़ा था, इसलिए आरोपी को अदालत से 1 से 2 महीने के भीतर बेहद आसानी से जमानत (Bail) मिल जाती। ऐसे में महज कानूनी कार्रवाई के डर से जान बचाने के लिए जान जोखिम में डाल देना (जैसे तालाब में कूदना) किसी भी लिहाज से सही नहीं था। काश! सौरव ने आत्मसमर्पण का रास्ता चुना होता, तो कुछ वक्त के बाद वह अपने परिजन के साथ होता।

दूसरी तरफ जब सौरव कुमार पुलिस अभिरक्षा से भागा, तो कानून की नजर में वह ‘कस्टडी से फरार आरोपी’ बन गया। अगर वह जिंदा रहता और बाद में पकड़ा जाता, तो उस पर कस्टडी से भागने की एक और नई धारा (जैसे IPC 224) लग जाती, जिससे उसकी जमानत मिलने में थोड़ी मुश्किल जरूर होती, लेकिन फिर भी उसे मौत की सजा कभी नहीं होती।


दूसरा पहलू: पुलिस पर हमला और आत्मरक्षार्थ पिस्टल तानने की मजबूरी

इस घटना का दूसरा और सबसे डरावना पहलू वह है जो मोरकाही थाना परिसर में देखने को मिला। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के दावों से साफ है कि न्याय की मांग कर रही भीड़ खुद कानून को हाथ में ले चुकी थी।

थानाध्यक्ष के साथ अभद्र व्यवहार और धक्का-मुक्की:

शव को थाने पर रखकर प्रदर्शन कर रहे उग्र लोगों ने महिला थानाध्यक्ष के साथ न सिर्फ धक्का-मुक्की की, बल्कि अभद्र व्यवहार भी किया।

पिस्टल तानना: कानून व्यवस्था बनाए रखने का अंतिम उपाय?

वीडियो और जमीनी इनपुट्स को देखें तो साफ समझ आता है कि अगर उस तनावपूर्ण माहौल में थानाध्यक्ष ने अपनी सर्विस पिस्टल नहीं निकाली होती, तो उग्र भीड़ पुलिस टीम पर कोई बड़ा हमला कर सकती थी। सरकारी हथियार का प्रदर्शन वहां किसी को डराने के लिए नहीं, बल्कि खुद की जान बचाने और थाने को उपद्रवियों से सुरक्षित रखने का एक ‘आत्मरक्षार्थ’ (Self-Defense) कदम था। अगर पुलिस पीछे हट जाती, तो शायद थाने में कोई और बड़ी अनहोनी या हिंसक वारदात घट सकती थी।

दोनों पहलुओं पर आत्ममंथन की जरूरत

इस पूरी घटना का दो पहलू हैं। आधिकारिक तथ्यों के अनुसार पुलिस अपनी ड्यूटी के तहत नामजद अभियुक्तों को पकड़ने गई थी, लेकिन प्रक्रियात्मक कमियों और आरोपी के डर ने एक जान ले ली। वहीं दूसरी तरफ, आरोपी की मौत से उपजा गुस्सा जायज हो सकता है, लेकिन उस गुस्से की आड़ में महिला पुलिस अधिकारी के साथ अभद्र व्यवहार करना और कानून को बंधक बनाने की कोशिश करना सरासर गलत था। वहीं प्रशासन को भी अपनी कार्यशैली में और अधिक संवेदनशीलता लाने की जरूरत है ताकि जनता का भरोसा पुलिस पर बना रहे।

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