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बबलू मंडल : संघर्ष व समर्पण के बल पर राजनीतिक जीवन के शीर्ष पर

लाइव खगड़िया (मनीष कुमार मनीष) : विगत के कई चुनावों में जिले के राजनीतिक जगत में एक चर्चा आम रहा करती थी कि चुनावी राजनीति से जमीनी कार्यकर्ताओं को पार्टियां दूर रखती है और रसूखदारों को ही तब्बजो दी जाती है. इस बात को लेकर वक्त-बेवक्त विभिन्न दलों के कार्यकर्ताओं के बीच मायूसी भी देखी जाती रही थी. लेकिन 2025 के चुनाव में इस मिथक को जदयू ने तोड़ दिया है और पार्टी ने खगड़िया विधानसभा सीट से एक ऐसे कार्यकर्ता को टिकट दी है जो आज के राजनीतिक परिदृश्य में टिकट की दौड़ में शामिल रसूखदारों के सामने काफी पीछे नजर आ रहे थे. लेकिन संगठन के प्रति उनकी वफादारी का इनाम उन्हें मिला है. जदयू के जिलाध्यक्ष बबलू कुमार मंडल को पार्टी ने खगड़िया विधानसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाकर आम कार्यकर्ताओं के बीच एक नई जोश भर दी है और निश्चय ही अब गेंद एनडीए के स्थानीय नेताओं व कार्यकर्ताओं के पाले में है. जदयू उम्मीदवार बबलू मंडल का चुनाव में प्रदर्शन विभिन्न राजनीतिक दलों के थिंक टैंक के लिए किसी आईने से कम नहीं होगा.

एनडीए के विभिन्न घटक दलों के संभावित उम्मीदवारों की रेस नहीं थी आसान

वैसे तो खगड़िया विधानसभा सीट जदयू की परंपरागत सीट रही है. चर्चित पूर्व विधायक रणवीर यादव की पत्नी पूनम देवी यादव खगड़िया विधानसभा सीट से लगातार चार बार विधायक रह चुकी हैं. हालांकि विगत विधानसभा चुनाव में वे जदयू उम्मीदवार के तौर पर यहां से काफी कम मतों से हार गईं थीं. 2020 के विधानसभा चुनाव में पूनम देवी यादव को कांग्रेस के छत्रपति यादव से मात्र तीन हजार मतों से हार का सामना करना पड़ा था. ऐसे में 2025 के चुनाव में भी पूनम देवी यादव की उम्मीदवारी को मजबूत माना जा रहा है. साथ ही जदयू के कई अन्य नेताओं की भी टिकट पर टकटकी लगी हुई थी. उधर एनडीए के घटक‌ दल भाजपा के स्थानीय नेता भी जिले में कम से कम एक सीट की मांग कर रहे थे. भाजपाइयों की भी नजर खगड़िया विधानसभा सीट पर भी थी. लेकिन तमाम उम्मीदों व कयासों के बीच जदयू के जिलाध्यक्ष बबलू मंडल सीट व टिकट खुद के नाम करने में सफल रहे.

वसूल के हैं पक्के, अबतक के राजनीतिक जीवन में देखें हैं कई उतार-चढ़ाव

बात 2019 की है, जब पार्टी के संगठनात्मक चुनाव में बबलू मंडल जदयू जिलाध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुए थे. लेकिन बाद में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के द्वारा लोकतांत्रिक व्यवस्था को दरकिनार कर चुनाव को रद्द कर दिया गया और एक निवर्तमान विधान पार्षद को जिलाध्यक्ष पद पर मनोनीत किया गया था. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के इस फैसले से नाराज होकर बबलू मंडल सहित जदयू के दर्जनों कार्यकर्ताओं ने पार्टी से सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया था. उस वक्त यह मामला काफी सुर्खियों में रहा था. हालांकि बाद में बबलू मंडल पुनः पार्टी में वापस लौटे और फिर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने जिलाध्यक्ष का पद उनकी झोली में वापस डाल दिया. उस वक्त जिला जदयू में आंतरिक गुटबाजी का दौर था और यह गुटबाजी जिले के राजनीतिक जगत में चर्चाओं में रहा करता था. बात उन दिनों की ही है जब जिले में एक कार्यक्रम के दौरान सीएम नीतीश कुमार के मंच पर बबलू मंडल नहीं पहुंच पाये थे. हालांकि मंच से उनके नाम की उद्घोषणा होता रहा और स्थिति कुछ ऐसी रचाई गई थी कि सीएम नीतीश कुमार के स्वागत के लिए लाया गया माला बबलू मंडल के हाथ ही रह गया था. लेकिन बाद के दिनों में एक जिलाध्यक्ष के तौर पर बबलू मंडल ने पार्टी की आंतरिक गुटबाजी को लगभग खत्म कर पार्टी को एकजुट करने में सफल रहे. साथ ही उन्होंने खुद की प्रभावशाली नेतृत्व क्षमता को भी प्रदर्शित किया.

देर से खुली किस्मत, लेकिन दुरूस्त आये

वैसे तो हर राजनीतिज्ञ की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने की चाहत होती है और बबलू मंडल की सोच भी इससे अलग नहीं थी. राजनीतिक हालात व राजनीतिक समीकरण के हिसाब से वर्षों से उनकी नजर बेलदौर विधानसभा सीट पर थी. लेकिन राजनीतिक हालात और वक्त बदलते देर नहीं लगती और वक्त व राजनीतिक हालात कुछ ऐसे बदला कि खगड़िया विधानसभा सीट से जदयू उम्मीदवार के तौर उन्हें टिकट मिल गई और आज वे अपने संघर्ष व संगठन के प्रति समर्पण के बल पर अपने राजनीतिक जीवन के शीर्ष पर बैठ चुके हैं. साथ ही जिले के राजनीतिक जगत के छुपा रूस्तम साबित हुए हैं.

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