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चिरनिद्रा में सोई मां को अपने पुत्रों के आने का है इंतजार, रहम करो सरकार

लाइव खगड़िया : राजनीति की वजह से भले ही पारिवारिक रिश्तों में दरार पैदा हो जाये, लेकिन परिवार में जब शोक का माहौल हो तो राजनीतिक बंधनों के डोर का टूट जाना और संबंधों की कटुता का मिट जाना भी आम बात है. शायद यह ही खून के रिश्ते की वो वास्तविक सच्चाई है, जिसे वक्त व हालात के बीच भाग-दौड़ की जिन्दगी में अक्सर भूला दिया जाता है.

जिले का एक चर्चित राजनीतिक घराना आज शोक में है और चिरनिद्रा में सोई एक मां को अपने बेटों के आने का इंतजार है. लेकिन वक्त और हालात कुछ ऐसे हैं कि बेटे को अपनी मां का अंतिम दर्शन के लिए जद्दोजहत करना पड़ रहा है और परिजन जिला प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं. दरअसल खगड़िया से दो बार सांसद एवं तीन बार विधायक रहे दिवंगत रामशरण यादव की पत्नी 95 वर्षीय शैल देवी का शनिवार को पटना में निधन हो गया. लेकिन एक मामले में उनके चारों पुत्र भरत यादव, विभूति यादव, अजय यादव एवं विजय कुमार उर्फ पांडव यादव भागलपुर के जेल में बंद हैं.

इधर दिवंगत सांसद की पत्नी शैल देवी के पार्थिव शरीर को जिले के मानसी थाना क्षेत्र के पैतृक गांव चुकती लाया गया और उनके अंतिम संस्कार में जेल में बंद उनके चारों पुत्रों को पैरोल पर शामिल होने की अनुमति देने की मांग परिजन जिला प्रशासन से कर रहे हैं. हलांकि अनुमति नहीं मिलने की स्थिति में परिजन मानसी पुलिस पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर जिला प्रशासन को गलत रिपोर्ट देने का आरोप भी लगा रहे हैं.

बताया जाता है कि पूर्व विधायक रणवीर यादव के भाई संजय यादव, उदय यादव, विवेकानन्द यादव, विक्रम यादव सहित मानसी प्रखंड के पूर्व प्रमुख बलवीर चांद के द्वारा भी बड़ी मां शैल देवी के अंतिम संस्कार में जेल में बंद भाईयों के शामिल होने की स्थिति में आपत्ति नहीं होने और अनुमति प्रदान करने का आवेदन दिया गया है. गौरतलब है कि इन दोनों ही परिवारों में भले ही राजनीतिक रूप से अदावत रही हो, लेकिन आज माहौल गम का है और परिस्थितियां भी अलग है.

इधर परिजन पूर्व सांसद की पत्नी शैल देवी का अंतिम संस्कार तब तक नहीं करने की बातें कह रहे हैं, जब तक कि जेल में बंद उनके चारों पुत्रों को कार्यक्रम में शामिल होने की अनुमति नहीं मिल जाती है. मिली जानकारी के अनुसार मामले को लेकर मानसी थाना में महिलाओं के द्वारा भी धरना दिया जा रहा है. बहरहाल देखना दीगर होगा कि मां का अंतिम दर्शन के लिए पुत्रों की बेकरार आंखों का इंतजार खत्म होता है या फिर मामला कानूनी दांवपेच में उलझ कर रह जाता है.

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