मुख्य सामग्री पर जाएं
Recent

रविवार से नवरात्रि शुरू,शुभ मुहूर्त में ही करें कलश स्थापना

IMG 20190929 WA0008




लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) : 29 सितंबर से शुरू हो रहे नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के सभी नौ रूपों की पूजा की जाती है. शरदीय नवरात्रि को मुख्य नवरात्रि माना जाता है और रविवार को कलश स्थापना के साथ मां की पूजा आरंभ हो जायेगी. डॉ. प्राण मोहन कुंवर, पंडित अजय कांत ठाकुर, कृष्णकांत झा बताते हैं कि विश्वविद्यालय पंचांग के मुताबिक कलश स्थापना अभिजीत  मुहूर्त एवं हस्त नक्षत्र में किया जाना अति उत्तम होता है. कलश स्थापना का उत्तम मुहूर्त रविवार की सुबह 11 बजकर 36 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर  24 मिनट तक है. साथ ही दिन भर भी कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त है.




पंडित गण बताते हैं कि कलश को सुख-समृद्धि ,ऐश्वर्य व मंगलकारी का प्रतीक माना जाता है. कलश के मुख में भगवान विष्णु , गले में रूद्र , मूल में ब्रह्मा तथा मध्य में देवी शक्ति का निवास माना जाता है. नवरात्री के समय ब्रह्माण्ड में उपस्थित शक्तियों का घट में आह्वान करके उसे कार्यरत किया जाता है. जिससे घर की सभी विपदादायक तरंगें नष्ट हो जाती है तथा घर में सुख, शांति तथा समृद्धि बनी रहती है.

20190925 193602

शारदीय नवरात्रि में मां की पूजा मंदिरों सहित घर-घर में की जाती हैं. इस क्रम में कलश स्थापित कर शारदीय नवरात्रा की पूजा विधि-विधान से किया जाता है. जिले के विभिन्न दुर्गा मंदिरों में शारदीय नवरात्रि को लेकर महिनों पूर्व से चल रही तैयारियां अंतिम चरण में है. वहीं पूजा पंडाल को आकर्षक ढंग से सजाया जा रहा है.

कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की होगी पूजा

मान्यता है कि मां शैलपुत्री की आराधना से मनोवांछित फल और कन्याओं को उत्तम वर की प्राप्ति होती है. साथ ही साधक को मूलाधार चक्र जाग्रत होने से प्राप्त होने वाली सिद्धियां हासिल होती है. कहा जाता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा अपने असली रुप में पृथ्‍वी पर ही रहतीं हैं. इसलिए मां के नौ स्वरुपों की पूजा-अर्चना और व्रत रखा जाता है.



नवरात्रा के पहले दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा की जाती है. बताया जाता है कि पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा है. पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या थीं. तब इनका नाम सती था. इनका विवाह भगवान शंकर से हुआ था. प्रजापति दक्ष के यज्ञ में सती ने अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया. इन्हें पार्वती और हैमवती भी कहा जाता है.

नवरात्र में मां दुर्गा के नौ रूपों की होगी पूजा   

29 सितंबर (रविवार) को प्रथम रूप शैलपुत्री

30 सितंबर (सोमवार) को द्वितीय रूप ब्रह्माचारणी

1 अक्टूबर (मंगलवार) को तृतीय रूप चंद्रघंटा

2 अक्टूबर (बुधवार) को चतुर्थ रूप कुष्मांडा

3 अक्टूबर (गुरूवार) को पंचम रूप स्कंदमाता

4 अक्टूबर (शुक्रवार) को षष्ठ रूप कात्यायनी

5 अक्टूबर (शनिवार) को सप्तम रूप कालरात्रि

6 अक्टूबर (रविवार) को अष्टम रूप महागौरी

7 अक्टूबर (सोमवार) को नवम रूप सिद्धिदात्री

8 अक्टूबर (मंगलवार) को दसवीं तिथि विजयादशमी


शेयर करें
शेयर
error: Content is protected !!