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अंग्रेजों को मिली बापू के उपस्थिति की भनक,खटिया पर छिपा ले भागे थे सेनानी

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लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) : जिले के गोगरी प्रखंड के दहगाना चांदपुर  निवासी स्वतंत्रता सेनानी स्व. मुरली मनोहर प्रसाद का नाम स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षर में दर्ज है. उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया. इस क्रम में उनपर अंग्रेजों की गोली भी चली लेकिन वे बच निकले. लगभग सौ वर्ष से अधिक की उम्र में भी वे समाज में शिक्षा का अलख जलाते हुए बच्चों व युवाओं को अपने घर पर नि:शुल्क अंग्रेजी व हिन्दी की शिक्षा देते रहे. इस बीच 109 वर्ष की आयु में इसी वर्ष 11 मार्च को उनका निधन हो गया.

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नौकरी त्याग कर कूदे थे स्वतंत्रता संग्राम में

6 सितंबर 1910 को जिले के गोगरी के राटन पंचायत के दहगाना निवासी मुरली मनोहर प्रसाद वर्ष 1940 के करीब चल रहे आजादी की लड़ाई में शिक्षक की नौकरी से त्यागपत्र देकर कूद पड़े और उन्होंने अपने साथियों के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध जंग छेड़ दिया. इस दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा. जबकि 16 अगस्त 1942 को गोगरी-मुंगेर घाट पर फिरंगियों के जहाज को रोकने के क्रम में अंग्रेजों द्वारा बरसायी गई गोली का उन्हें शिकार होना पड़ा. जिसमें वे जख्मी हो गए. लेकिन उन्होंने खुद को छिपते-छिपाते हुये अपनी जान बचाई और आजादी की जंग में अपनी भागीदारी निभाते रहे. देश को आजादी मिलने के बाद उनके मन में एक बार फिर एक शिक्षक की भावना जग उठी और वे घर पर ही गांव और समाज के बच्चों के बीच नि:शुल्क शिक्षा का प्रसार करने लगे. इतना ही नहीं उम्र के एक पड़ाव पर जब उनका शरीर जवाब दे गया तो भी वे बिस्तर पर से ही बच्चों द्वारा पूछे जाने वाले सवाल का जवाब देने से कभी पीछे नहीं रहे और अंतिम वक्त तक समाज में वे शिक्षा की लौ जलाते रहे.




बापू को अंग्रेजों से छिपाकर खटिया पर ले भागे थे

बात उन दिनों की है जब विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करते हुए उसे जलाया जा रहा था. इसी दौरान स्थानीय आंदोलनकारी सुरेश चन्द्र मिश्र के अनुरोध पर डॉ. राजेन्द्र बाबू के साथ गांधी जी गोगरी के गंगा तट पर स्टीमर से आए. असहयोग आंदोलन तेज होने के कारण ब्रिटिश हुकूमत परेशान थी और अंग्रेज पुलिस गांधी को खोज रही थी. जब अंग्रेजों को यह जानकारी मिली कि वे गोगरी में हैं तो वहीं उनकी गिरफ्तारी की योजना बनाई गई. लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों को कानोकान यह खबर मिल गई. फिर क्या था, इन लोगों ने गांधी जी को खटिया में बिठाकर स्टीमर से गंगा पार करा दिया. हालांकि गांधी ऐसा नहीं चाहते थे. लेकिन उन्हें अपने समर्थकों की बात आखिर में माननी ही पड़ी थी.

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बापू को था खगड़िया से गहरा लगाव

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को खगड़िया के लोगों से गहरा लगाव रहा था. यही कारण था कि वे ना केवल यहां आए बल्कि कई दिनों तक रहकर स्वदेशी का पाठ पढ़ाते हुए लोगों के बीच शांति, सद्भाव, सौहार्द व अहिंसा का संदेश देते रहे थे. असहयोग आंदोलन के दौरान 1920 में वे गोगरी के जिस कमरे में ठहरे थे और खासकर जिस खूंटी पर उनका झोला टंगा था, वह आज भी बापू की यादों को ताजा कर जाता है. लेकिन एक दुखद पहलू यह है कि वो खपरैल का मकान आज अपना अस्तित्व खोने के कगार पर है. जिस खपरैल के मकान में बापू ठहरे थे उसे गांधी ग्राम आश्रम का दर्जा तो मिल गया. लेकिन अब तक उसे संरक्षित नहीं किया जा सका है.

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