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(हास्य-व्यंग्य) : हम खगड़िया वाले…

लाइव खगड़िया : विनोद कुमार विक्की की यह रचना खगड़िया की ज़मीनी हकीकत, वहाँ की संस्कृति और जनजीवन का एक शानदार ‘एक्स-रे’ है। हास्य और व्यंग्य का पुट इतना सटीक है कि पढ़ते हुए चेहरे पर मुस्कान और व्यवस्था पर हल्की टीस दोनों महसूस होती है।

जल-प्रेम और लोकतांत्रिक सड़कें

हम खगड़िया वासी बड़े सहनशील, धैर्यवान और परम सौभाग्यशाली हैं। दुनिया का आधा हिस्सा जहाँ जल संकट से जूझ रहा है, वहीं हमें सात-सात नदियों का दिव्य आशीर्वाद प्राप्त है। हमारा नदियों से इतना आत्मीय संबंध है कि हर वर्ष कभी ‘गंगा मैया’ तो कभी ‘कोसी मैया’ स्वयं घर-घर दस्तक देने चली आती हैं। यहाँ नहाने, धोने और तैरने से लेकर डूबने तक की समुचित व्यवस्था प्रकृति स्वयं नि:शुल्क करती है।
बाढ़ के मौसम में हमारी बहुद्देशीय सड़कें परिवहन मार्ग कम और ‘मवेशी शेल्टर होम’ अधिक प्रतीत होती हैं। सड़क पर आदमी, गाय, बकरी, ट्रैक्टर और नाव—सब ‘समाजवाद’ और ‘लोकतंत्र’ का पालन करते हुए कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं।

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प्रेम का ‘ऊँचा’ पैमाना

नफ़रत से कोसों दूर हम खगड़िया वाले प्रेम में अगाध विश्वास रखते हैं। यहाँ प्रेम जाति, उम्र और वैवाहिक स्थिति की संकीर्ण बेड़ियों में कैद नहीं रहता। हमारे यहाँ प्रेम इतना पारदर्शी है कि चार बच्चों की अम्मा भी तीन बच्चों के पिता के साथ ‘नया संसार’ बसाने में संकोच नहीं करतीं। वहीं, नई पीढ़ी के युवा अपने प्रेम की पताका फहराने के लिए ‘मोबाइल टावर’ जैसे ऊँचे शिखरों का चयन करते हैं। शायद हमारा मानना है कि प्रेम जितना गहरा हो, उसका प्रदर्शन उतनी ही ऊँचाई से होना चाहिए।

अतिक्रमण और अदम्य साहस

हमारे रेहड़ी-पटरी वाले दुकानदार सड़क से ‘फेविकोल’ जैसा जुड़ाव रखते हैं। प्रशासन चाहे अतिक्रमण हटाने के चक्कर में अपनी लाठियाँ तुड़वा ले, लेकिन इन जांबाज़ों का आत्मविश्वास नहीं तोड़ पाता। कार्रवाई के अगले ही दिन वही जोश, वही जज़्बा और सड़क के उसी पुराने ‘स्लॉट’ पर दुकान सजाकर जाम लगाने की जो कला ये प्रदर्शित करते हैं, वह किसी ‘अदम्य शौर्य’ से कम नहीं है।

विकास की ‘कल्पना’ और आशावाद

हम खगड़िया वासी जन्मजात आशावादी हैं। धरातल पर विकास हो न हो, सरकार की एक घोषणा मात्र से हमारा मन प्रफुल्लित हो जाता है। अगुवानी का पुल बने या न बने, गिरते-पड़ते ढाँचों को देखकर भी हमारा भरोसा अडिग रहता है कि “एक दिन तो पुल ज़रूर बनेगा!”

महेशखूंट रेलवे क्रॉसिंग पर फाटक गिरते ही हम बाइक बंद कर ‘ध्यान मुद्रा’ में चले जाते हैं और ओवरब्रिज का सपना देखने लगते हैं। दस-पंद्रह मिनट बाद हमारा ध्यान तब भंग होता है, जब ट्रेन गुजरने के बाद पीछे वाला वाहन चालक ‘पें-पें’ की कर्णभेदी ध्वनि से हमें मोक्ष से वापस धरती पर लाता है।

जलजमाव में ‘नैनीताल’ का अहसास

NH-31 पर घंटों जाम में फँसने के बावजूद ‘फोरलेन’ की कल्पना मात्र से हमारे चेहरे पर रौनक लौट आती है। महेशखूंट और केशव चौक जैसे प्रमुख बाज़ारों में बारिश के बाद जो जलजमाव होता है, वह हमें बिना टिकट ‘नैनीताल की झील’ वाला अहसास करा देता है।

रही बात मुंगेर-खगड़िया मार्ग की, तो वहाँ चलने वाले टेम्पो और जीप वाहन नहीं, बल्कि ‘चलती-फिरती पुरातात्त्विक धरोहरें’ हैं। कई गाड़ियों की जर्जर हालत देखकर लगता है कि ये सीधे ब्रिटिश म्यूजियम से भागकर आई हैं और अब केवल ड्राइवर की दुआ और यात्रियों की देशभक्ति के बल पर सड़क को नाप रही हैं।

संस्कार और सरोकार

हम खगड़िया वाले जितने संवेदनशील हैं, उतने ही जज़्बाती भी। सामने वाले के ‘एटीट्यूड’ के अनुसार हमारे संबोधन—’आप’, ‘अपनय’, ‘तोय’ से ‘तोरा’ तक—पलक झपकते बदल जाते हैं। मेहमानवाज़ी में हम ‘कसरैया धार’ की मछली, ‘दियारा’ का दही और ‘करूआ मोड़’ का पेड़ा परोसते हैं, तो विवाद होने पर ‘लाठी और कट्टा’ निकालने में भी देर नहीं करते।

सीमा पर हम जांबाज़ हैं, तो अपने इलाके में थोड़े रंगबाज़ हैं। जब भी जीवन में तनाव बढ़ता है, हम ‘छैला बिहारी’ का अंगिका गीत लगाकर झूम लेते हैं और दुनिया के सारे गम भुला देते हैं।

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