लाइव खगड़िया : बिहार अब देश का ऐसा राज्य बनने जा रहा है जो बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने के लिए एक ठोस और सख्त पॉलिसी लाएगा। विधानसभा में जदयू विधायक समृद्ध वर्मा द्वारा उठाए गए सवालों के बाद, आईटी मंत्री श्रेयसी सिंह ने स्पष्ट किया कि सरकार इसे केवल तकनीक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संकट के रूप में देख रही है।

इस नई नीति के मुख्य स्तंभ:
- विशेषज्ञों की एंट्री: सरकार ने बेंगलुरु स्थित NIMHANS (राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान) के विशेषज्ञों से सलाह मांगी है।
- बहुविभागीय एक्शन: आईटी, शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग मिलकर एक ‘कंबाइंड गाइडलाइन’ तैयार करेंगे।
- स्कूलों में सख्ती: क्लासरूम और स्कूल परिसर के भीतर मोबाइल के इस्तेमाल पर नई पाबंदियां लग सकती हैं।
易 ‘अदृश्य महामारी’ और डोपामाइन का खेल
विधायक समृद्ध वर्मा ने सदन में बेहद तकनीकी और मनोवैज्ञानिक पहलू को उजागर किया। उन्होंने बताया कि कैसे लगातार रील्स और शॉर्ट वीडियो देखने से बच्चों के दिमाग में डोपामाइन का स्तर असंतुलित हो रहा है।
”जब बच्चे घंटों रील स्क्रॉल करते हैं, तो उन्हें असल जिंदगी नीरस लगने लगती है। उनकी एकाग्रता (Concentration) खत्म हो रही है। यह एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट है।” — समृद्ध वर्मा, विधायक
️ क्या हैं सरकार को दिए गए सुझाव?
सदन में चर्चा के दौरान बच्चों को इस लत से बाहर निकालने के लिए कुछ क्रांतिकारी सुझाव भी सामने आए हैं:

आगे क्या?
उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भरोसा दिलाया है कि सरकार जल्द ही इस पर ठोस नीति लाएगी। यह पॉलिसी न केवल बच्चों को एआई (AI) जैसी नई तकनीक से जोड़ेगी, बल्कि उन्हें डिजिटल दुनिया के खतरों से बचाने के लिए एक ‘सुरक्षा कवच’ भी प्रदान करेगी।
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