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देवदूत बनकर आए दारोगा, जब गंगा की लहरों और मौत के बीच ढाल बन गया खाकी का जज्बा

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लाइव खगड़िया : कहते हैं कि मौत और जिंदगी के बीच बस कुछ पलों का फासला होता है। विक्रमशिला सेतु पर यह फासला तब मिटने ही वाला था, जब एक हताश माँ अपनी तीन महीने की मासूम ‘लाडो’ को सीने से लिपटाए गंगा की लहरों में समा जाने को तैयार थी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था—वहां मौत की राह में खाकी वर्दी पहने एक ‘देवदूत’ खड़ा था।

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“जा मर जा…” उन तीन शब्दों ने तोड़ दी थी हिम्मत

पीड़ित महिला, जिसकी पहचान राघवपुर की जीरा देवी के रूप में हुई, की कहानी किसी भी पत्थर दिल को रुला दे। 10 साल पहले जिस सौरभ कुमार से प्रेम विवाह किया था, आज उसी के तानों और मारपीट ने उसे इस मोड़ पर खड़ा कर दिया। पति के अवैध संबंधों और रोज की प्रताड़ना के बीच जब पति ने घर से निकालते हुए कहा— “कहीं जाकर मर जाओ,” तो टूट चुकी जीरा देवी ने मौत को ही गले लगाना बेहतर समझा।

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सिक्के के दो पहलू: एक तरफ नफरत, दूसरी तरफ फर्ज

डायल-112 के दारोगा सिकंदर कुमार अपनी ड्यूटी खत्म कर घर लौट रहे थे। पुल पर एक बदहवास महिला को संदिग्ध हालत में देखकर उन्होंने खतरे को भांप लिया।

  • बिजली सी फुर्ती: जैसे ही महिला छलांग लगाने को बढ़ी, सिकंदर ने बिना वक्त गंवाए उसकी साड़ी पकड़कर पीछे खींच लिया।
  • ममता और सुरक्षा: उन्होंने तुरंत रोती हुई बच्ची को गोद में लिया और बिलखती मां को सांत्वना दी।
  • साहस की पराकाष्ठा: दारोगा सिकंदर ने बाद में कहा, “वह बेहद डरी हुई थी। अगर वह पानी में कूद जाती, तो मैं भी उसे बचाने के लिए पीछे छलांग लगा देता।”

काउंसिलिंग ने जगाई जीने की आस

​इस घटना के बाद पुलिस ने केवल उसकी जान ही नहीं बचाई, बल्कि उसे जीने का मकसद भी दिया। विक्रमशिला टीओपी में हुई काउंसलिंग के बाद जीरा देवी को अपनी गलती का एहसास हुआ। अब उसने कसम खाई है कि वह हार नहीं मानेगी और मजदूरी करके भी अपने बच्चों (बेटे लाडो और बेटी मुस्कान) को पालेगी।

सोशल मीडिया पर ‘सिंघम’ की चर्चा > घटना का वीडियो वायरल होने के बाद लोग दारोगा सिकंदर की तत्परता और संवेदनशीलता की जमकर तारीफ कर रहे हैं। वरिष्ठ अधिकारियों ने भी उनकी इस बहादुरी के लिए उनकी पीठ थपथपायी है।

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