लाइव खगड़िया : बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी (BPCC) के भीतर मची खींचतान अब सार्वजनिक रूप से सामने आ गई है। प्रदेश अनुशासन समिति ने ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ का हवाला देते हुए दो वरिष्ठ नेता–खगड़िया के पूर्व विधायक छत्रपति यादव और रिसर्च विभाग के पूर्व चेयरमैन आनंद माधव—को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है। हालांकि, निष्कासित नेताओं ने इस आदेश को सिरे से खारिज करते हुए इसे पार्टी संविधान का उल्लंघन करार दिया है।
पक्ष 1: अनुशासन समिति का सख्त कदम
अनुशासन समिति के अध्यक्ष कपिलदेव प्रसाद यादव द्वारा जारी आधिकारिक पत्र (संख्या 07, दिनांक 18/02/2026) के अनुसार, आनंद माधव और छत्रपति यादव की संलिप्तता पार्टी विरोधी गतिविधियों में लगातार बढ़ती पाई गई। पत्र में उल्लेख है कि:
- विषय की गंभीरता को देखते हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के बिहार प्रभारी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष से विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया।
- दोनों नेताओं की प्राथमिक सदस्यता छह वर्षों के लिए तत्काल प्रभाव से समाप्त की जाती है।
- इसकी प्रतियां संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल और बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावारू को भी भेजी गई हैं।
पक्ष 2: छत्रपति यादव की चुनौती – “यह पत्र बेबुनियाद है”
निष्कासन के तुरंत बाद पूर्व विधायक छत्रपति यादव ने एक भावुक और आक्रामक अपील जारी कर इसे चुनौती दी है। उनका कहना है कि यह कार्यवाही पूरी तरह से असंवैधानिक है। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:
- संविधान का हवाला: छत्रपति यादव के अनुसार, AICC सदस्य का निष्कासन केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष की अनुशंसा पर और राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) के हस्ताक्षरित पत्र द्वारा ही मान्य होता है। प्रदेश समिति का यह पत्र अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
- अपील: उन्होंने कार्यकर्ताओं से पूछा है कि क्या वे इस “बेबुनियाद” पत्र से सहमत हैं? उन्होंने इसे गलत लोगों के विरोध को दबाने की कोशिश बताया।
- आंदोलन का संकल्प: निष्कासन के बावजूद उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘बिहार कांग्रेस बचाओ अभियान’ के तहत जिलों का भ्रमण जारी रहेगा। उन्होंने राहुल गांधी के नारे ‘डरो मत’ का आह्वान करते हुए 17 मार्च 2026 को पटना में होने वाले महासम्मेलन में जुटने की अपील की है।
फिलहाल, बिहार कांग्रेस दो फाड़ नजर आ रही है। जहां एक ओर संगठन अनुशासन का डंडा चला रहा है, वहीं दूसरी ओर निष्कासित नेता इसे पार्टी को बचाने की लड़ाई बता रहे हैं। अब सबकी नजरें केंद्रीय नेतृत्व पर टिकी हैं कि क्या वह इस निष्कासन पर मुहर लगाता है या हस्तक्षेप कर बीच का रास्ता निकालता है।
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