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मकरसंक्रांति विशेष : वो दही का मटका, चूड़ा की पोटली और रिश्तों का मधुर एहसास




लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र): फरकिया का इलाका दूध-दही के लिए अपनी एक अलग पहचान रखता है. मकरसंक्रांति को सूखा पर्व भी कहा जाता है. क्योंकि पर्व के दौरान घर में दो दिनों तक दही-चूड़ा, तिलकुट-तिलवा, गुड़ खाने की परंपरा रही है और इन दो दिनों घर में चूल्हा ही नहीं जलता था.

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गौरतलब है कि जिला में दूग्ध का उत्पादन बड़े पैमाने पर होती है. मकरसंक्रांति के मौके पर अंग की धरती से उपजी सुगंधित चावल से बना चूड़ा, गन्ने रस का भूरा गुड़ आदि अपने रिश्तेदार के यहां भेजने की परंपरा रही है. इलाके के मशहूर मिट्टी के बर्तन में जमे दही एवं तिलवा-तिलकुट की अपनी अलग पहचान रखती है. मकरसंक्रांति के मौके पर इन खाद्य सामग्रियों का आदान-प्रदान एक सप्ताह तक चलता था. इन सब के बीच महिलाओं की मायके से पहुंचने वाली दहीभरा मटका और चूड़ा का मोटरी घर के माहौल को खास बना देता था और चौखट पर नैहर का संदेशा पहुंचते ही महिलाएं फूले नहीं समाती थी. मायके का संदेशा पहुंचते ही टोला-मोहल्ला भर के लोग जान जाते थे. लेकिन अब इस परंपरा का चलन कम देखने को मिलता है. बदलते जमाने ने पुरानी परंपरा को धीरे-धीरे विलुप्त कर दिया है.


वो दौर भी रहा था जब मकरसंक्रांति के एक सप्ताह पूर्व से ही बस-ट्रेन से चूड़ा एवं मिट्टी के बर्तन में जमाया गया दही लेकर लोग अपने रिश्तेदार के यहां पहुंचते थे. घर के नए रिश्तेदार को मकर संक्रांति का बेसब्री से इंतजार रहता था. क्योंकि इस मौके पर आदान-प्रदान की एक विशेष परंपरा की रस्म अदा होती थी. कहीं पिता अपनी नवविवाहिता बेटी के यहां मकर संक्रांति के मौके पर मिट्टी के बर्तन में जमा हुआ दही को अपने माथे पर लेकर जाते थे. ताकि जमा दही टूट ना सके. इस पुरानी परंपरा में रिश्तों का मधुर एहसास था.

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इधर ठंड के साथ शहर के बाजारों में तिलकुट की सौंधी खुशबू फैल चुकी है. मकर संक्रांति के मौके पर तिलकुट का कारोबार अपने चरम पर है और बाजार तिलकुट से सज गया है. खगड़िया में बनने वाले तिलकुट का जिला ही नहीं बल्कि कोसी इलाकों में भी मांग है. सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, अररिया, पूर्णिया, समस्तीपुर, बेगूसराय आदि जगहों पर यहां के तिलकुट पहुंचती रही है. खगड़िया से सौगात के रूप में भी तिलकुट व दही भेंट करने की पुरानी परंपरा रही है.


संक्रांति के करीब डेढ़ महीना पहले से ही यहां तिलकुट का व्यवसाय शुरू हो जाता है. कारीगरों को बाहर से बुलाकर तिलकुट का व्यवसाय करने वाले दुकानदारों का कहना है कि एक सीजन में लाखों का कारोबार हो जाता है और यहां के तिलकुट की अपनी अलग पहचान है. बताया जाता है कि स्थानीय कारीगर तिलकुट में स्वाद और सुंदरता नहीं दे पाते है. इसलिए गया के कारीगरों को यहां तिलकुट बनाने को बुलाया जाता है. बहरहाल बाजार तिलकुट के प्रकारों से सज चुका है और ग्राहक भी ताजे तिलकुट की मांग कर रहे हैं.

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