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खगड़िया : आसान नहीं होगा टिकट की रेस में शामिल भाजपा नेताओं का सफर




लाइव खगड़िया (मनीष कुमार) : गठबंधन की चुनावी राजनीति के दौर में टिकट की रेस में शामिल भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए जिले में राहें आसान होती नहीं दिख रही है. बात यदि विगत वर्षों के चुनाव में भाजपा उम्मीदवारों की करें तो 1995 के विधानसभा चुनाव में खगड़िया से चंद्रमुखी देवी को मौका मिला था और वे जीत हासिल कर विधायक बनीं थीं. हलांकि 2000 में उन्हें सीपीएम के योगेन्द्र सिंह से हार का सामना करना पड़ा था. जिसके बाद गठबंधन के चुनावी राजनीति के बीच टिकट के लिए भाजपा को जिले में 15 सालों का इंतजार करना पड़ा था और 2015 के चुनाव में जिले के परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से रामानुज चौधरी को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया था. लेकिन उस चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिल सकी थी.

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उल्लेखनीय है कि 2015 के चुनाव के वक्त जदयू एनडीए का दामन छोड़ गया था. बावजूद इसके एनडीए के घटक दलों के बीच भाजपा को जिले के चार विधान सभा क्षेत्रों में से सिर्फ एक सीट परबत्ता की मिली थी. जबकि जिले का अलौली व बेलदौर का सीट एनडीए के घटक दल लोजपा के कोटे में रही थी और खगड़िया की सीट उस वक्त एनडीए के घटक दलों में शामिल ‘हम’ के नाम रहा था. इसके पूर्व 2010 के चुनाव में जिले के चारों विधानसभा की सीट एनडीए के जदयू कोटे में रही थी. 2010 के चुनाव में अलौली, खगड़िया व बेलदौर की सीट पर जदयू ने फतह हासिल की थी. जबकि परबत्ता की सीट पर जदयू उम्मीदवार महज 802 मतों के अंतर से चुनाव हार गये थे. हलांकि बाद में परबत्ता विधानसभा सीट पर 2014 के उपचुनाव में जदयू उम्मीदवार रामानंद सिंह पुनः एक बड़ी जीत दर्ज करने में सफल रहे थे.

वर्तमान में जदयू एनडीए के घटक दलों में शामिल है और जिले के चार विधानसभा सीटों में से तीन खगड़िया, परबत्ता व बेलदौर पर जदयू का कब्जा है. यह स्थितियां ही भाजपा से टिकट की रेस में शामिल नेताओं के लिए परेशानियों का सबब पैदा कर सकता है. जिला भाजपा के अंदरखाने से जो खबर आ रही है उस लिहाज से भाजपा की नजर जिले के खगड़िया व परबत्ता विधानसभा की सीटों पर से पार्टी के उम्मीदवारी पर है. लेकिन दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों पर जदयू के दो पुराने योद्धाओं का कब्जा है. खगड़िया की सीट पर पूनम देवी यादव जदयू की टिकट पर लगातार तीन जीत दर्ज कर वर्तमान में विधायक हैं. जबकि वे फरवरी 2005 के चुनाव में भी लोजपा की टिकट पर जीत का परचम लहरा चुकी हैं. यदि एक उम्मीदवार को तौर पर देखा जाये तो पूनम देवी यादव खगड़िया से लगातार चार जीत अपने नाम कर चुकी हैं. गौरतलब है कि जदयू विधायक पूनम देवी यादव खगड़िया के चर्चित पूर्व विधायक रणवीर यादव की पत्नी हैं. दूसरी तरफ परबत्ता की सीट पर भी जदयू के वर्तमान विधायक रामानंद प्रसाद सिंह का वर्षों से दबदबा रहा है. इस सीट से वो लगातार तीन सहित कुल पांच बार जदयू की टिकट पर जीत दर्ज कर चुके हैं और वर्तमान में वे यहां के विधायक हैं. इस बार परबत्ता से उनके पुत्र डॉ संजीव कुमार का जदयू की टिकट पर चुनाव लड़ने की चर्चाएं हैं. चुनाव को लेकर उनकी गतिविधियां भी तेज हो गई है. ऐसे में आगामी 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए जिले में एनडीए के घटक दलों के बीच से इस दोनों ही सीटों में से किसी एक को भी अपने कोटे में लाना बहुत आसान नहीं दिख रहा.

बावजूद इसके राजनीति संभावनाओं का खेल है और अप्रत्याशित रूप से कोई बड़ा उलट-फेर सामने आ जाना राजनीतिक लिहाज व हालात से बड़ी बात नहीं होगी. बात यदि भाजपा की तरफ से उम्मीदवारी के रेस में शामिल पार्टी कार्यकर्ताओं की करें तो परबत्ता विधानसभा सभा क्षेत्र में बीते चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार रहे रामानुज चौधरी की इस सीट पर एक बार फिर नजर है. शायद यही कारण रहा है कि हार के बावजूद भी विभिन्न मौके पर वे क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं. भाजपा के जिला महामंत्री बाबू लाल शौर्य की भी इस सीट पर वर्षों से नजर रही है. हाल के दिनों में उन्होंने जिला स्तर पर भी संगठन में अपनी मजबूत पकड़ बना ली हैं. साथ ही उनके नाम जनसरोकार के मुद्दे पर संघर्ष का अपना एक अलग रिकार्ड रहा है. वे मूल रूप से परबत्ता विधानसभा क्षेत्र के ही निवासी हैं. भूमिहार बहुल परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से टिकट की चाहत रखने वाले इसी समुदाय के इन दोनों नेताओं का टिकट के लिए सफर कितना लंबा चलता है, यह देखना दीगर होगा.


राजनीतिक गलियारे में चल रही चर्चाओं पर यदि विश्वास करें तो यदि किसी भी परिस्थिति में एनडीए के घटक दलों के बीच खगड़िया की सीट भाजपा कोटे में आती है तो भाजपा के इन दोनों नेताओं की दावेदारी यहां भी कायम रह सकती है. ऱामानुज चौधर मूल रूप से इसी विधानसभा क्षेत्र के निवासी हैं. जबकि बाबूलाल शौर्य की खगड़िया राजनीतिक व सामाजिक कर्मभूमि रही है. लेकिन खगड़िया विधानसभा क्षेत्र का जातिगत समीकरण इन दोनों ही नेताओं की राह में संकट पैदा कर सकता है. बात यदि यादव समुदाय के उम्मीदवार तक पहुंचती है तो भाजपा नेता विजेन्द्र यादव, जितेन्द्र यादव जैसों की बांछे खिल सकती है. हलांकि डॉ अमर सत्यम भी आंतरिक तौर पर संगठन में काफी सक्रिय रहे हैं और वो भी यादव समुदाय से ही आते हैं. इस बीच हाल के दिनों में डॉ सलील यादव की सक्रियता बढी है. जिसे भी चुनावी नजरियें से ही देखा जा रहा है. बताया जाता है कि उन्होंने कुछ माह पूर्व ही भाजपा की सक्रिय सदस्यता ग्रहण किया है. बात यदि महिला उम्मीदवार के चयन तक जा पहुंचती है तो भाजपा महिला मोर्चा के जिलाध्यक्ष वंदना कुमार का टिकट के लिए जोर आजमाइश देखने को मिल सकता है. हाल के दिनों में भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जे पी नड्डा द्वारा भाजपा में जिलाध्यक्ष को टिकट नहीं मिलने संबंधित दिये गये बयान पर गौर करें तो भाजपा के जिलाध्यक्ष सुनील कुमार टिकट की रेस से बाहर दिखते हैं. बहरहाल इन सभी संभावना और कयासों के बावजूद एनडीए के घटक दलों के बीच से जिले में भाजपा कोटे में सीटों को निकाल लाना पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं दिख रहा.

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