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…जब डायरिया के मरीज को चढ़ाया जा रहा था जाॉन्डिस का स्लाइन




लाइव खगड़िया : आज नेशनल डॉक्टर्स डे है. हर वर्ष 1 जुलाई को भारत में डॉक्टर्स डे मनाया जाता है. यह दिन महान फिजिशियन और पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री डॉक्टर बिधान चन्द्र राय की पुण्यतिथि है. निश्चय ही इस अवसर पर किसी डॉक्टर की कलम से लिखी गई कुछ बातों को पढना रोचक होगा. प्रस्तुत है जिले के चर्चित सामाजसेवी डॉक्टर स्वामी विवेकानंद की कलम से लिखी गई वो बातें जो सिस्टम की खामियों को भी उजागर कर रहा है और एक चिकित्सक की बेबसी को भी. हलांकि मामला आज से 15-16 साल पूर्व का बताया जा रहा है.

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इसके पहले कि डॉक्टर स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखी गई बातों पर आप नजर डालें, उसके पहले स्पष्ट कर दूं कि इसे उन्होंने अपने फेसबुक वाल पर शेयर किया है. आगे अब पढिए डॉ स्वामी विवेकानंद का पोस्ट उन्हीं के शब्दों में…

चिकित्सक दिवस के अवसर पर एक सच्ची घटना

यह घटना वर्ष 2004 की है. जिले में भयंकर बाढ़ आई हुई थी. वर्ष 1987 से ही जब मैं एमबीबीएस का इंटर्नशिप कर रहा था, उसी वक्त से खगड़िया में बाढ़ पीड़ितों की सेवा करता आ रहा हूं. हर साल टीम बनाकर बाढ के बाद डायरिया का प्रकोप से लोगों को बचाने के लिए दिन-रात मेहनत किया करता था.

वर्ष 2004 में सदर अस्पताल पुराने भवन में चल रहा था और अत्यंत बदहाल था. लेकिन गरीब मरीजों के लिए वही एक मात्र सहारा था. एक दिन किसी मरीज से मुलाकात करने के लिए मैं सदर अस्पताल पहुंचा और मैं यह देखकर दंग रह गया कि डायरिया के मरीज को जॉन्डिस के मरीज का बोतल चलाया जा रहा है. यह पानी डायरिया को और बढ़ा जाता है और जिससे मरीजों की मौत भी हो सकती है. दोपहर का समय था, जो डॉक्टर ड्यूटी पर थे, वे हमसे सीनियर थे. मैंने उनसे पूछा ऐसा क्यों हो रहा है ! तब उन्होंने दबी आवाज में बताया कि अस्पताल में इलाज के नाम पर कोई दवा नहीं है. यहां तक कि कॉटन बैंडेज भी मरीज से मंगवा कर उसका उपचार करते हैं. डायरिया के लिए जो सलाइन बोतल चाहिए, वह अस्पताल में मौजूद नहीं है. लेकिन जॉन्डिस का मरीज के लिए जो 10% डेक्सट्रोज आया वह रखा ही रह गया. क्योंकि उसका मरीज नहीं मिला तो खानापूर्ति के लिए वही बोतल चढ़ा रहे हैं. जब मैंने कहा कि यह तो जानलेवा है तो उनका उत्तर था कि यदि यह बोतल चढ़ाते हैं तो मरीज मरेगा और यदि नहीं चढ़ाएं तो ड्यूटी पर आए डॉक्टर की पिटाई होगी, यानी डॉक्टर मरेगा. (पोस्ट के कुछ अंश को हटाया गया है).

मैं घर वापस आया और पूरी रात सोचता रहा कि मैं डॉक्टर होकर डॉक्टर का साथ दूँ या मरीजों का ! पूरी रात आंखों में नींद नहीं आयी. अगली सुबह सिविल सर्जन कार्यालय पहुंचा और पूछा ऐसा क्यों हो रहा है ! कुल मिलाकर उनका कहना था हम यहां नौकरी करने आए हैं. अस्पताल में दवा आपूर्ति सरकार का काम है. सरकार से हमने दवा की मांग की है और 1 महीने तक में उम्मीद है दवा आ जाएगी. लेकिन यह बताइए डॉक्टर अपनी ड्यूटी करें या अपनी जेब से दवा खरीद कर मरीज में लगाए ! क्योंकि सदर अस्पताल में मरीज दवा खरीदने के लिए तैयार नहीं है और वह डॉक्टर को चोर बताते हैं. डॉक्टर से यह संभव नहीं है कि वह मरीजों के लिए दवा की व्यवस्था कर सके.


अगली रात भी मेरी नींद गायब थी. एक तरफ डॉक्टर दूसरी तरफ मरीज. यदि जरा भी हल्ला किया तो डॉक्टर का जीना मुश्किल हो जाएगा और चुप रहा तो मरीज का बचना मुश्किल हो जाएगा. मैंने इंजीनियर धर्मेंद्र को बुलाया और सारी स्थिति बताई. जिसके बाद एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया कि जब तक सरकारी दवा की आपूर्ति नहीं होती है, तब तक सदर अस्पताल में होने वाले सारे मरीजों का खर्च मैं वहन करूंगा. डॉक्टर को ही बचा लूंगा और मरीज को मरने नहीं दूंगा.

सिविल सर्जन ने एक आदेश निकाल कर 1 महीने के लिए सदर अस्पताल को हमारे हवाले कर दिया. डीजल-पेट्रोल से लेकर सारी दवाइयां प्रतिदिन उपलब्ध कराता रहा. उस समय मेरी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. लेकिन हौसला बुलंद था, बड़ी मुश्किल से एक महीना संभाला. फिर सिविल सर्जन खगड़िया से मिला तो उन्होंने एक और पत्र थमा दिया कि एक महीना सहयोग के लिए धन्यवाद, कृपया एक महीना और अपनी सेवा जारी रखें. क्योंकि दवा आपूर्ति में विलंब है. 2 महीने के बाद डायरिया का केस आना बंद हो गया और उपलब्धि यह रही कि उस 2 महीने के दौरान सदर अस्पताल में कोई मरीज नहीं मरा. लेकिन जब तक मैं चार्ज लिया उसके पहले 40 मरीज 1 सप्ताह में मर चुके थे. इस 2 महीने के दौरान कई तरह के मरीज आए और सबको दवा सहित सारी सुविधा मुफ्त दी गई. सदर अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार 2 महीने में एक भी मरीज ना रेफर हुआ और ना उसकी मौत हुई. इस बीच मेहसौरी के एक मरीज को कोलड़ा से बचाने में 127 बोतल लाइन लगाया था. उसी परिवार का मुखिया मोहम्मद करीम ही खगड़िया के सारे पोल पर तिरंगा बनाकर जय खगरिया लिखा है.

ईश्वर का लाख-लाख शुक्रिया ।।

डॉ स्वामी विवेकानंद


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