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…और अरूण ने कलम के साथ चुनावी मैदान में उठा ली थी तलवार

खगड़िया : जिले के मीडिया जगत में अरूण वर्मा एक काफी पूराना नाम है.विगत चार दशकों में उन्होंने जिले की पत्रकारिता के कई रंग देखे हैं.यह भी एक सच्चाई है कि जितना लंबा उनका पत्रकारिता के क्षेत्र में अनुभव रहा है उतना आज जिले के कई सक्रिय पत्रकारों की कुल उम्र भी नहीं.वर्ष 1977 में ‘बिहार जीवन’ नामक एक हिन्दी दैनिक से उन्होंने पत्रकारिता की दुनियां में कदम रखा था.वक्त का पहिया जैसे-जैसे घूमता गया वैसे-वैसे वो दैनिक आज,दैनिक आत्म कथा,दैनिक पाटलीपुत्र टाइम्स,संध्या प्रहरी,राष्ट्रीय सहारा,प्रभात खबर,सोनभद्र एक्सप्रेस, स्वराज खबर व तरूण मित्र जैसे अखबारों की गाड़ी पर चढते-उतरते गये.बहरहाल वो दैनिक जागरण में एक वरीय संवाददाता के रूप में अपनी भूमिका निभा रहे हैं.

बहुत कम लोगों को पता होगा कि 80 के दशक में अरूण वर्मा ने राजनीति के क्षेत्र में भी अपनी किस्मत आजमाई थी.वो एक बार विधायक का तथा दो बार सांसद का चुनाव भी खगड़िया से लड़ चुके हैं.हलांकि इन तीनों ही चुनावों में उन्हें सफलता नहीं मिली.बाबजूद इसके उनकी सामाजिक गतिविधियों में रूचि कम नहीं हुई और वो पत्रकारिता के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक कार्यों में अपना हाथ बंटाते रहे.लगभग 42 वर्षों से होली के पूर्व आयोजित होने वाले ‘महामूर्ख सम्मेलन’ उनकी ही देन है और आजतक इस कार्यक्रम के आयोजन की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधे पर रही है.’महामूर्ख सम्मेलन’ के आयोजन की शुरूआत का भी एक बड़ा ही दिलचस्प किस्सा है.गौरतलब है कि शहर का ‘राजेन्द्र चौक’ कभी ‘बघबा चौक’ के नाम से प्रचलित हुआ करता था.उस वक्त वहां ‘अशोक स्तंभ’ का प्रतिक था.जिस प्रतिक में बाघ की आकृति को देख लोंग इसे ‘बघबा चौक’ कहने लगे थे.अशोक स्तंभ जैसे सम्मानित प्रतिक को ‘बघबा’ कहा जाना अरूण को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने होली के बहाने ही महामूर्खों की सम्मेलन करा डाली.जो चार दशकों से अधिक समय से चलता आ रहा है और आज यह कार्यक्रम जिले में अपनी एक अलग पहचान बना चुकी है.इतना ही नहीं अरूण के सामाजिक क्रिया-कलापों की एक लंबी लिस्ट है.जिसमें 90 के दशक में जिला जज की पदस्थापना के लिए जिला व्यवहार न्यायालय में उनके द्वारा की गई सात दिनों का अनशन भी शामिल है.

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अरूण वर्मा

भलें ही अरूण ने जिले की पत्रकारिता को अपना चार दशक से अधिक का एक लंबा वक्त दिया हो.लेकिन उन्हें जिले की पत्रकारिता जगत ने वो मुकाम नहीं दिया जो उन्हें वास्तविक तौर पर मिलनी चाहिए थी.इसका आभास उन्हें भी है.शायद यही वजह रही है कि उन्होंने अपना दर्द वयान करते हुए कहा कि “वक्त के अनुसार सभी ने अपने-अपने ढंग से सिर्फ इस्तेमाल ही किया है”. बाबजूद इसके आज वो जिस मुकाम पर हैं उससे वो संतुष्ट जरूर हैं लेकिन उनकी सोच व उनकी मंजिल कुछ और ही है.जिस दिशा में वो आज भी प्रयासरत है.डिजिटल होती दुनियां में भी सुबह सबेरे खबरों के संकलन के लिए उनका निकल जाना और देऱ शाम तक खबरों की दुनियां में यूं ही लगे रहना उनके जज्बें व जुनून को दर्शाता है.हलांकि पत्रकारिता के लंबे सफर में उनकी जिन्दगी में पत्नी शोक रूपी एक दुखद मोड़ भी आया जब उनके कदम लड़खड़ाने लगे थे.यह वो घड़ी थी जब उन्हें अपने छोटे-छोटे बच्चों को पिता के दायित्व निभाने के साथ ही दुनियां छोड़ चली मां का प्यार भी देना था.लेकिन कहा जाता है कि यदि इरादे अलट हो तो राही मंजिल का नया पता ढूंढ ही लेता है. आज अरूण वक्त के उस नाजुक मोड़ से बहुत आगे निकल चुके है और पत्रकारिता की राह पर उनका घोड़ा सरपट दौड़ता ही चला जा रहा है.



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