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राजपूती शौर्य का प्रतीक बना ‘राजधानी एक्सप्रेस’, खगड़िया के इस घोड़े ने बिहार में गाड़े सफलता के झंडे

लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र): बिहार के घुड़सवारी मैदानों में इन दिनों एक ही नाम की गूँज है— ‘राजधानी एक्सप्रेस’। खगड़िया जिले के माधवपुर निवासी कटिमन सिंह का यह घोड़ा अपनी अद्भुत रफ्तार, अनुशासन और राजपूती परंपरा के जीवंत उदाहरण के रूप में उभर कर सामने आया है। 17 वर्षीय यह अनुभवी घोड़ा आज किसी पहचान का मोहताज नहीं है।

30 से अधिक खिताबों पर कब्जा

राजधानी एक्सप्रेस ने अब तक बिहार के विभिन्न जिलों में आयोजित घुड़दौड़ प्रतियोगिताओं में अपनी धाक जमाई है। इसकी फुर्ती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह अब तक 30 से अधिक शील्ड अपने नाम कर चुका है। मैदान में उतरते ही इसकी बिजली जैसी तेजी के सामने प्रतिद्वंद्वी घोड़े टिक नहीं पाते।

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मैदान में उतरने से पहले ‘व्रत’ जैसा अनुशासन

​इस घोड़े से जुड़ी सबसे हैरान करने वाली बात इसकी संवेदनशीलता है। कटिमन सिंह बताते हैं कि:

  • ​प्रतियोगिता से 2-3 दिन पहले ही घोड़े को इसका आभास हो जाता है।
  • मैदान में उतरने की तैयारी के रूप में यह खुद ही अपना दाना-पानी कम कर देता है।
  • ​स्वयं को हल्का और फुर्तीला बनाए रखने का यह प्राकृतिक अनुशासन विशेषज्ञों को भी अचंभे में डाल देता है।

पिता का जुनून, पुत्र का कौशल

राजधानी एक्सप्रेस की सफलता के पीछे कटिमन सिंह की मेहनत और उनके पुत्र बाबू साहब का बेहतरीन तालमेल है। बाबू साहब खुद इस घोड़े की सवारी करते हैं और मैदान में इसकी लगाम संभालते हैं। पिता-पुत्र की जोड़ी और इस घोड़े के अटूट रिश्ते ने इसे बिहार का सबसे चर्चित घोड़ा बना दिया है।

​”मेरे घोड़े की ताकत और फुर्ती का पूरे बिहार में कोई जोड़ नहीं है। यह सिर्फ एक घोड़ा नहीं, बल्कि हमारे अनुशासन और मेहनत का प्रतीक है।”

कटिमन सिंह, अश्व पालक

​खगड़िया का यह ‘राजधानी एक्सप्रेस’ आज केवल एक पशु नहीं, बल्कि इलाके के गौरव और पारंपरिक घुड़सवारी की विरासत का नया चेहरा बन चुका है।

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