लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) : बिहार के बुनियादी ढांचे में क्रांति लाने का दावा करने वाला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बहुचर्चित ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’—अगुवानी-सुल्तानगंज फोरलेन गंगा पुल—आज अपनी बदहाली और देरी के कारण सुर्खियों में है। वर्षों की प्रतीक्षा और करोड़ों की लागत के बावजूद, मुख्यमंत्री रहते हुए इस पुल का उद्घाटन करने का नीतीश कुमार का सपना अब अधूरा नजर आ रहा है।
शिलान्यास से विवादों तक का सफर
इस महत्वाकांक्षी परियोजना की नींव 23 फरवरी 2014 को जिले के परबत्ता के केएमडी कॉलेज मैदान में रखी गई थी। इसके बाद 9 मार्च 2015 को सुल्तानगंज से विधिवत निर्माण कार्य शुरू हुआ। उम्मीद थी कि यह पुल उत्तर और दक्षिण बिहार की दूरी को पाट देगा, लेकिन समय के साथ यह प्रोजेक्ट ‘विकास’ के बजाय ‘विवादों’ का पर्याय बन गया।
- तीन बार ढहा ढांचा: निर्माण के दौरान पुल का अलग-अलग हिस्सों में तीन बार गिरना न केवल बिहार बल्कि पूरे देश में चर्चा का विषय बना।
- सवालों के घेरे में गुणवत्ता: बार-बार हुए हादसों ने निर्माण की गुणवत्ता और सरकार की निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े किए।
- कार्रवाई का अभाव: स्थानीय जनता में इस बात को लेकर गहरा असंतोष है कि इतने बड़े हादसों और कथित अनियमितताओं के बाद भी अब तक किसी पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
नीतीश कुमार की विशेष रुचि: विश्व की पहली ‘डॉल्फिन वेधशाला’
इस पुल की सबसे अनोखी विशेषता इसमें प्रस्तावित डॉल्फिन वेधशाला (Dolphin Observatory) है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जिन्होंने 2009 में गंगा डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित कराने में मुख्य भूमिका निभाई थी, उनकी इस प्रोजेक्ट में व्यक्तिगत रुचि थी।
खास बात: यह विश्व की पहली ऐसी परियोजना मानी जा रही थी, जहां फोरलेन पुल के ऊपर से गुजरते हुए लोग गंगा की दुर्लभ डॉल्फिनों का दीदार कर सकते। कहलगांव से अगुवानी के बीच का यह क्षेत्र डॉल्फिनों का प्राकृतिक आवास है, जिसे पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने का सपना मुख्यमंत्री ने देखा था।
2027 की नई समय सीमा: क्या पूरा होगा वादा?
खगड़िया और आसपास के जिलों के लोगों को उम्मीद थी कि जिस पुल का शिलान्यास नीतीश कुमार ने किया, उसका उद्घाटन भी वे अपने हाथों से करेंगे। वर्तमान राजनीतिक और तकनीकी परिस्थितियों को देखते हुए यह सपना फिलहाल धूमिल पड़ता दिख रहा है।
- वर्तमान स्थिति: प्रोजेक्ट फिलहाल अधर में है।
- नई डेडलाइन: अब इस फोरलेन पुल को 2027 तक पूरा कर जनता को समर्पित करने की बात कही जा रही है।
फिलहाल, अगुवानी-सुल्तानगंज पुल का अधूरा ढांचा न केवल बिहार के विकास की सुस्त रफ्तार की गवाही दे रहा है, बल्कि एक मुख्यमंत्री की उस व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को भी दर्शा रहा है जो भ्रष्टाचार और तकनीकी विफलताओं की भेंट चढ़ गई।






