लाइव खगड़िया: “हम आ नहीं पाएंगे… अंतिम संस्कार का खर्च ऑनलाइन ले लीजिए और हमें वीडियो भेज देना।” — यह शब्द किसी बेगाने के नहीं, बल्कि उन तीन बेटियों के हैं जिन्हें एक पिता ने अपने आंसुओं और खून-पसीने की कमाई से पढ़ा-लिखाकर समाज में ‘शिक्षक’ (Teacher) के प्रतिष्ठित पद पर पहुंचाया था।
यह हृदयविदारक घटना हरियाणा के सोनीपत के ककरोई गांव की है, जहाँ इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला एक मामला सामने आया है। कभी मुंबई की रंगीनियों और बाजारों में करोड़ों रुपये के कपड़ा कारोबार का साम्राज्य चलाने वाले शिवचरण गुप्ता ने अपनी जिंदगी के अंतिम दिन एक वृद्धाश्रम के वीरान कमरे में बिताए और मंगलवार को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
करोड़ों के मालिक से वृद्धाश्रम का सफर
वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि व्यापार में भारी घाटा होने के कारण शिवचरण गुप्ता का कारोबार ठप हो गया। जो पिता कभी अपनी बेटियों की हर ख्वाहिश पूरी करता था, वक्त की मार ने उसे अकेला छोड़ दिया। हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी तीनों बेटियों को काबिल बनाकर नेपाल, मुंबई और उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में शिक्षक के रूप में स्थापित किया। लेकिन अफ़सोस, जिन हाथों को उन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उन्हीं हाथों ने बुढ़ापे में उनका साथ छोड़ दिया।
बेटियों की संवेदनहीनता: किसी ने पैसे भेजे, तो किसी ने वीडियो कॉल से काम चलाया। जब आनंदआश्रम के संचालकों ने नेपाल, मुंबई और आजमगढ़ में रह रहीं उनकी तीनों शिक्षक बेटियों को उनके पिता के निधन की सूचना दी, तो जो जवाब मिला उसने सुनने वालों की रूह कंपा दी।
मुंबई में रहने वाली बेटी ने खुद आने की जहमत नहीं उठाई, बल्कि 5100 रुपये ऑनलाइन भेजकर अंतिम संस्कार करने को कह दिया।
नेपाल में रह रही बेटी ने वृद्धाश्रम आकर पिता का चेहरा देखने के बजाय वीडियो कॉल के जरिए ही अंतिम विदाई देखना ही मुनासिब समझा।
वहीं, तीसरी बेटी ने तो इस औपचारिकता से भी पल्ला झाड़ लिया और आना जरूरी नहीं समझा।
जब अपनों ने ही मुखाग्नि देने और कंधा देने से मुंह मोड़ लिया, तब आगे आए समाजसेवियों ने इंसानियत का फर्ज निभाते हुए शिवचरण गुप्ता के पार्थिव शरीर को कंधा दिया और उनका अंतिम संस्कार किया।
जाते-जाते भी दे गए जिंदगी की रोशनी
भले ही अपनों ने उन्हें बिसार दिया हो, लेकिन शिवचरण गुप्ता जीते-जी मानवता की एक ऐसी अनमोल मिसाल छोड़ गए जो सदियों तक याद रखी जाएगी। उन्होंने जीवित रहते हुए ही अपने नेत्रदान का संकल्प लिया था, और उनके निधन के बाद उनकी दोनों आंखें दान कर दी गईं—ताकि वे खुद इस दुनिया में न रहें, लेकिन किसी और की दुनिया रोशन कर सकें।
यह खबर सिर्फ एक पिता की मौत की नहीं, बल्कि उस आधुनिक सोच और रिश्तों की टूटी हुई डोर पर एक करारा सवाल है, जहां डिग्रियां तो बढ़ गईं, लेकिन मानवीय संवेदनाएं मर गईं।






