लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र): जिले के परबत्ता प्रखंड अंतर्गत कोलवारा गांव में अंग प्रदेश की प्रसिद्ध लोकगाथा बिहुला-विषहरी पूजा को लेकर इन दिनों चारों तरफ श्रद्धा और उत्साह का माहौल है। कोलवारा पंचायत के वार्ड संख्या 18 स्थित विषहरी मंदिर में आयोजित इस वार्षिक अनुष्ठान में खगड़िया के अलावा आसपास के जिलों से भी भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना के साथ-साथ लोककला, नृत्य और आकर्षक झांकियों की प्रस्तुतियां लोगों के मुख्य आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
छह दशकों से चली आ रही है परंपरा
ग्रामीणों—अनिरुद्ध दास, सुदीन दास, जयप्रकाश दास, सीताराम दास, मुन्नी लाल दास, मनीष कुमार और ज्ञानी दास ने बताया कि यहां करीब 60 वर्षों से बाला बिहुला-विषहरी की पूजा अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव से की जा रही है। ग्रामीणों के आपसी सहयोग से ही इस मंदिर का निर्माण कराया गया है और हर साल इस आयोजन को लेकर विशेष तैयारियां की जाती हैं।
सिंह नक्षत्र में मध्यरात्रि को स्थापित हुई प्रतिमाएं
मान्यता के अनुसार, हर वर्ष 16 अगस्त की देर रात सिंह नक्षत्र के प्रवेश के समय विषहरी एवं सती बिहुला की प्रतिमा को पिंडी पर स्थापित कर मुख्य अनुष्ठान की शुरुआत की जाती है। इस वर्ष भी मध्यरात्रि को पूरे विधि-विधान के साथ प्रतिमाएं स्थापित की गईं। इन भव्य प्रतिमाओं को भागलपुर जिले के नाथनगर थाना क्षेत्र के फतेहपुर गांव निवासी मूर्तिकार मिथिलेश कुमार और पंकज कुमार ने तैयार किया है।
इस पावन आयोजन में पांच बहनों—जया विषहरी, पदुम कुमारी, दोतिला भवानी, मैना विषहरी और देवी विषहरी के साथ-साथ सती बिहुला, बाला लखेंद्र और चंद्रधर सौदागर की प्रतिमाएं भी स्थापित की जाती हैं।
रात में सजता है लोकगाथा का मंच
पूजा के दौरान हर रात स्थानीय कलाकार लोकगाथा पर आधारित पारंपरिक नृत्य और झांकियां प्रस्तुत करते हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें विभिन्न आयु वर्ग के स्थानीय कलाकार उत्साहपूर्वक हिस्सा लेते हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही अंग प्रदेश की इस सांस्कृतिक परंपरा को ग्रामीण आज भी पूरी शिद्दत से निभा रहे हैं।
क्या है बिहुला-विषहरी की लोकगाथा?
मान्यता के अनुसार, बिहुला-विषहरी की यह लोकगाथा भागलपुर के चंपानगर के शिवभक्त एवं प्रख्यात व्यापारी चांदो सौदागर से जुड़ी है। विषहरी को भगवान शिव की पुत्री माना जाता है। कथा के अनुसार, जब चांदो सौदागर ने विषहरी की पूजा स्वीकार नहीं की, तो कई प्रतिकूल घटनाएं घटीं। चांदो सौदागर के पुत्र बाला लखेंद्र का विवाह बिहुला से होता है, लेकिन विवाह की ही रात सर्पदंश से बाला लखेंद्र की मृत्यु हो जाती है।
इसके बाद, सती बिहुला अपने पति के शव को केले के तने से बनी एक विशेष नाव पर रखकर गंगा के रास्ते स्वर्गलोक तक की लंबी यात्रा करती हैं। अपनी असीम भक्ति और तपस्या के बल पर वे पति के प्राण पुनः वापस लेकर लौटती हैं। इस घटना के बाद चांदो सौदागर विषहरी की पूजा करने के लिए सहमत होते हैं। लोकमान्यता है कि उन्होंने बाएं हाथ से पूजा की थी, और तभी से विषहरी पूजा में बाएं हाथ से पूजा करने की अनूठी परंपरा चली आ रही है।
17-18 अगस्त को चढ़ेगा डलिया, 20 को होगा विसर्जन
ग्रामीण कंपनी दास, अनिरुद्ध दास, विपिन दास और संजय कुमार ने जानकारी दी कि 17 और 18 अगस्त को श्रद्धालुगण डलिया चढ़ाने के साथ माता को दूध और लावा का भोग अर्पित करेंगे। इसके बाद दोपहर के समय मनौन भजन का आयोजन किया जाएगा। वहीं, आगामी 20 अगस्त की शाम को पूरे धूमधाम और गाजे-बाजे के साथ प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा।
पूजा समिति के सभी सदस्य इस आयोजन को सफल बनाने में पूरी तरह सक्रिय हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल एक धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि अंग प्रदेश की प्राचीन लोकसंस्कृति और पुरानी परंपराओं को जीवंत रखने वाला एक महान पर्व है। यही कारण है कि हर वर्ष दूर-दराज से श्रद्धालु कोलवारा पहुंचकर बिहुला-विषहरी के दरबार में अपनी हाजिरी लगाते हैं और मन्नतें मांगते हैं।






