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स्वतंत्रता सेनानी जमुना चौधरी 9 माह की सजा काटी थी भागलपुर जेल में




लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) : जिले के परबत्ता प्रखंड अंतर्गत कन्हैयाचक निवासी स्वतंत्रता सेनानी स्व. जमुना चौधरी का आज पुण्यतिथि है.उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में अंग्रेजों से लोहा लेते हुए लोगों में देश भक्ति की भावना जगाया था.ताकतवर शरीर,साहसी,कड़क आवाज,आर्थिक दृष्टिकोण से संपन्न स्व.जमुना च़ौधरी अंग्रेजों की हूकुमत के खिलाफ बगावत व समाजिक कार्यो में भी बढ़-चढ कर हिस्सा लेते रहे थे.

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गरीबो की मसीहा के रूप में उनके उदार दिल व पराक्रम की कहानियां आज भी लोगों की जुबान से सुनी-सुनाई जाती है.उनका जन्म कन्हैयाचक में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था.बताया जाता है कि वर्ष 1942 में महात्मा गांधी ने जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान करो या मरो का नारा दिया था.उस वक्त हजारों भारतवासी शहीद हुए थे और लाखों आंदोलनकारियों को ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था.इस दौरान आंदोलनकारियों ने कई क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था और आंदोलन की आग गांव-गांव में फैल चुकी थी.

बलिया,मुंगेर,मुजफ्फरपुर,सतारा,कोल्हापुर,तालचर,तामलुक,मुर्शिदाबाद आदि अनेकों जिलों पर आंदोलनकारियों का कब्जा हो गया.बलिया पर पुनः नियंत्रण करने के लिए ब्रिटिश वायुसेना को बमबारी करनी पड़ी.ब्रिटिश दमन के कारण आंदोलन हिंसक रूप ले चुका था.आंदोलनकारियों के द्वारा रेल पटरियां उखाड़े जाने व टेलीफोन के तारों को तहस नहस किया जाने लगा और कई डाकखानों को भी ध्वस्त कर दिया गया.इस दौरान देश की शासकीय संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा.



स्वतंत्रता संग्राम में स्व. जमुना चौधरी ने भी अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया था.इस बाबत 16 फरवरी 1943 को मुंगेर न्यायालय के मजिस्ट्रेट महम्मुद अजगूल ने भारतीय दण्ड संहिता एक्ट के तहत उन्हें नौ माह की सश्रम कारावास और 25 रुपया का जुर्माना की सजा सुनाया था.जुर्माना की राशि नही देने पर एक माह का सश्रम सजा का फैसला दिया गया था.इस सजा को स्व. जमुना चौधरी ने केन्द्रीय कारा भागलपुर में काटा था.

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बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नही हारी और अंग्रेजो से लोहा लेते रहे.स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका के साथ ही स्व.जमुना चौधरी के बारे में कई अन्य चर्चाएं भी इलाके मे व्याप्त है.बताया जाता है कि एक बार राजा कृष्णनंदन उनके उदारता की परीक्षा लेने उनके पास पहुंचे और कर्ज के रुप में कुछ रूपये की मांग बैठे.परन्तु स्व.जमुना चौधरी बिना कोई हिचकिहाट राजा कृष्णनंदन को रूपया सौप दिया था.जिसके उपरांत राजा कृष्णनंदन ने उन्हें राजस्व ग्राम पुरस्कार देने का प्रस्ताव रखा.लेकिन उदार दिल के धनी स्व.जमुना चौधरी ने पुरस्कार लेने से साफ इंकार कर दिया था.उन्होंने गांव में शिक्षा की अलख जलाने के लिए एक बीघा जमीन भी दान किया था.जो आज मध्य विद्यालय कन्हैयाचक दक्षिणी के रुप में जाना जाता है.स्थानीय लोग बताते हैं कि स्व.जमुना चौधरी के द्वारा लिए गए निर्णय को कोई काट नही सकता था.साथ ही क्षेत्र के लोग भी उनके निर्णय की सराहना किया करते थे.स्वतंत्रा सेनानी जमुना प्रसाद का निधन वर्ष 22 नवम्बर 1992 को हो गया.बहरहाल उनकी पत्नी राम दाय देवी को केंद्र एवं बिहार सरकार के द्वारा स्वतंत्रता सेनानी का पेंशन दिया जा रहा है.



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