लाइव खगड़िया : “शिव भारतीय चेतना में केवल एक देव-प्रतिमा नहीं, बल्कि कल्याण, सत्य और ज्ञान के प्रतीक हैं। समय के साथ शिव-भक्ति में आए कर्मकांड और बाह्य आडंबरों को दूर कर महर्षि दयानंद सरस्वती ने इसे वेदोक्त प्रकाश में पुनः प्रतिष्ठित किया।” यह विचार डॉ. ऋचा योगमयी ने महर्षि दयानंद योग आश्रम, विद्याधार में आयोजित ‘ऋषि बोधोत्सव’ के अवसर पर व्यक्त किया।
बोध की वह घटना, जिसने बदला इतिहास
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. ऋचा ने बालक मूलशंकर (महर्षि दयानंद) के जीवन की उस युगांतरकारी घटना का उल्लेख किया, जिसने उन्हें सत्य की खोज के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि शिवरात्रि की रात शिवलिंग पर चूहे को प्रसाद कुतरते देख बालक मूलशंकर के मन में प्रश्न उठा कि—“जो स्वयं की रक्षा न कर सके, वह जगत का रक्षक कैसे?” यही प्रश्न उनके भीतर शिव-तत्व की खोज का बीज बना। वेदों के अध्ययन से उन्हें बोध हुआ कि:
- शिव का अर्थ निराकार, सर्वव्यापक और अविनाशी परमेश्वर है।
- सच्ची भक्ति केवल दूध-धतूरा चढ़ाने में नहीं, बल्कि सत्याचरण और संयम में है।

महर्षि दयानंद का जीवन ही शिव-भक्ति का आदर्श
यज्ञ के ब्रह्मा धर्मेंद्र शास्त्री ने कहा कि महर्षि दयानंद का जीवन स्वयं शिव-भक्ति का जीवंत उदाहरण था। उनके संन्यास में संयम, वाणी में सत्य और कर्म में निर्भीकता कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने उपस्थित जनसमूह से महर्षि के आदर्शों को जीवन में उतारने का आह्वान किया।
प्रमुख उपस्थिति
इस पावन अवसर पर आर्य समाज की प्रमुख विभूतियों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे, जिनमें मुख्य हैं:
- श्रीमती निर्मल ज्ञानमयी (प्रधान, आर्य समाज)
- गीता देवी आर्या (उप प्रधान)
- नरेंद्र ब्रह्मचारी (संचालक, दयानंद योग आश्रम)
- अंजनी आर्य, अभिनव आर्य, रेणुका देवी, साक्षी, अन्नु, ऋषिका, अभिषेक और विनायक।
कार्यक्रम के अंत में दयानंद योग आश्रम के संचालक धर्मगुरु नरेंद्र ब्रह्मचारी ने सभी आगंतुकों का आभार एवं धन्यवाद ज्ञापन किया।






