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बलदेव बाबू को अपनी गोद में उठा चिकित्सक के पास पहुंचाया था देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद

लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) : मंगलवार को पूरा देश स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी में हैं. निश्चय ही यह दिन भारत के प्रत्येक नागरिकों के लिए बेहद ही महत्वपूर्ण और खास है, क्योंकि इस दिन ही देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ था. स्वतंत्रता दिवस के दिन आजादी दिलाने वाले क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों, महत्वपूर्ण योगदान को देश याद करता है. जिनकी बदौलत भारतवर्ष 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ था. इस कड़ी में आज जिले के गोगरी प्रखंड के सोंडिहा निवासी स्वतंत्रता सेनानी बलदेव दास की भी याद ताजा हो रही है. उनका जन्म पसराहा पंचायत के सोंडिहा में 1913 ई में एक गरीब पिछड़ा परिवार में हुआ था. बलदेव दास के माता का नाम सावित्री देवी और पिता का नाम कन्तलाल सिंह था. तीन भाई बलदेव दास, जगदेव सिंह, चिन्त नारायण सिंह व एक बहन गंगिया देवी में बलदेव दास बड़े थे. वे बचपन से ही सात्विक विचार के थे और गांधी के विचारों से प्रभावित होकर देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में उन्होंने अपने आप को झोंक दिया.

सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन चरम पर था. इस दौरान भागलपुर जिला के थाना बिहपुर में राजेंद्र बाबू आंदोलन कारियों के होसला बढ़ा रहे थे. इसी बीच अंग्रेज अधिकारियों ने लाठी चार्ज करा दिया. जिससे आजादी के दीवानों की भीड़ में भगदड़ मच गई. राजेन्द्र बाबू नीचे गिर गए और गोरे सिपाहियों उस पर लाठी-डंडे बरसाने लगे. लेकिन जिले के बलदेब दास को देश भक्त डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पीटते देखा नहीं गया और वे राजेन्द्र बाबू के शरीर पर गिर गये. लेकिन अंग्रेज सिपाही बलदेव दास पर लाठियां बरसाते रहे. फिर लाठियां से जब अंग्रेजों का मन नही भरा तो साइकिल में हवा भरने वाले पम्प से उनके कान में हवा दी जाने लगी और बलदेव दास के कान की दीवार फट गई. अंग्रेजों के जुल्म से बलदेव दास की स्थिति मरणासन्न हो गई, लेकिन उन्होंने राजेन्द्र प्रसाद को बचा लिया.

इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी स्वतंत्रता सेनानी धनिकलाल सिंह बताया करते थे कि घटना के बाद लोगों की भीड़ इकट्ठी हुई और राजेन्द्र बाबू को उठाया गया. फिर राजेन्द्र बाबू जीवन रक्षक बलदेव दास को अपनी गोद मे उठाकार भागलपुर के प्रसिद्ध चिकित्सक शिवनारायण सिंह के पास ले गए और अपने खर्च पर उनका इलाज कराया. आजादी के बाद जब राजेन्द्र बाबू देश के प्रथम राष्ट्रपति बने तो बलदेव दास को अध्यापक की नौकरी दिया गया. साथ ही उन्होंने अपने निजी कोष से जीवनपर्यंत उन्हें पेंशन देते रहे.

1974 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बलदेव दास को ताम्र – पत्र से सम्मानित किया था. उनके पुत्र अनिरुद्ध सिंह, जय प्रकाश सिंह व श्रीप्रकाश सिंह बताते हैं कि सेवा निवृत्ति के बाद पिताजी को दो पेंसन का लाभ मिलता रहा. लेकिन खगड़िया जिला में बलदेव दास के नाम से न कोई गली या सड़क का नाम ही है और न ही उनका कोई स्मारक. हलांकि तीनो पुत्र के प्रयास से पसराहा रेलवे ढाला के पास स्वतंत्रता सेनानी बलदेब बाबू के स्मृति में एक गेट का निर्माण कराया गया है. अनिरुद्ध सिंह, जयप्रकश सिंह व श्रीप्रकाश सिंह गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर बलदेव दास गेट पर तिरंगा फहरा कर अपने पिता की बलिदान को याद कर लिया करते है. महान स्वतंत्रता सेनानी बलदेव दास के भतीजा रमेश सिंह, पंचायत समिति सदस्य जयचंद्र कुमार, पवन कुमार व प्रवीण सिंह ने बताते हैं कि बलदेव बाबू महात्मा गांधी को अपना गुरू मानते थे और हर समय “रघुपतिराघव राजा राम पतित पावन सीता राम” गाते रहते थे. बलदेव दास की मृत्यु 29 अक्टूबर 2000 को उनके पैतृक गांव सोंडिहा में हुआ था.

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