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अखंड सौभाग्य की कामना के साथ 13 दिवसीय मधुश्रावणी पूजा आरंभ

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लाइव खगड़िया (मुकेश कुमार मिश्र) : मिथिला संस्कृति का महान पर्व मधुश्रावणी पूजा अखंड सौभाग्य के कामना के साथ सोमवार से आरंभ हुआ. इसके पूर्व रविवार को नवविवाहिता ने नहाय-खाय किया. तेरह दिवसीय पूजा को लेकर भक्ति का माहौल बन गया है. पूजा के प्रथम दिन नवविवाहिता सुहागिन महिलाओं ने सुहाग दिया. साथ ही नवविवाहिता ने सुहागिन महिलाओं को मेंहदी एवं अन्य सामग्री भेंट की. कथा वाचक द्वारा प्रथम दिन शीत बसंत एवं बिषहरी की कथा का नवविवाहिता ने रस पान किया.

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पूजा के पहले दिन नाग-नागिन व उनके पांच बच्चे (बिसहारा) को मिंट्टी से गढ़ा गया. साथ ही हल्दी से गौरी बनाने की परंपरा पुरी की गई. पूजा के क्रम में 13 दिनों तक हर सुबह नवविवाहिताएं फूल और शाम में पत्ते लोढ़ेगी. इस त्यौहार के साथ प्रकृति का भी गहरा नाता है. मिंट्टी और हरियाली से जुड़े इस पूजा के पीछे पति के लंबी आयु की कामना होती है.



ससुराल से श्रृंगार पेटी

यह पूजा नवविवाहिता अक्सर अपने मायके में ही करती है. पूजा शुरू होने से पहले ही उनके लिए ससुराल से श्रृंगार पेटी आ चुकी होती है. जिसमें साड़ी, लहठी (लाह की चूड़ी), सिन्दूर, धान का लावा, जाही-जूही (फूल-पत्ती) आदि सामग्री होता है. साथ ही इसमें मायकेवालों के लिए भी तोहफे शामिल होता है.

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माता गौरी के गाए जाते हैं गीत

नवविवाहिता  फूल-पत्ते तोड़ते समय और कथा सुनते वक्त एक ही साड़ी हर दिन पहनती हैं. पूजा स्थल पर अरिपन (रंगोली) बनायी गई. फिर नाग-नागिन, बिसहारा पर फूल-पत्ते चढ़ाकर पूजा शुरू किया गया.

नाग-नागिन पर बासी फूल चढाया गया

ऐसी मान्यता है कि माता गौरी को बासी फूल नहीं चढ़ता जाता है और नाग-नागिन को बासी फूल-पत्ते चढ़ाने की परम्परा है. पूजा के प्रथम दिन मैना (कंचू) के पांच पत्ते पर हर दिन सिन्दूर, मेंहदी, काजल, चंदन और पिठार से छोटे-छोटे नाग-नागिन बनाया गया और 7 तरह के पत्ते और विभिन्न प्रकार के फूल  पूजा में प्रयोग किया गया.


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